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अफ्रीका में मांग घटने से भारतीय चावल निर्यात को झटका, वित्त वर्ष 2025-26 में निर्यात मूल्य 10% गिरा
ICN24 Newsroom 21 जून 2026, 12:57 am

वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय चावल निर्यात के मूल्य में 10% की गिरावट दर्ज की गई है, जिसका मुख्य कारण अफ्रीकी बाजारों में मांग की कमी और वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव है।
नई दिल्ली: वैश्विक कृषि व्यापार में भारत की अग्रणी भूमिका के बावजूद, चालू वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय चावल निर्यात क्षेत्र को एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष के शुरुआती महीनों में भारत के चावल निर्यात के कुल मूल्य में 10 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि, यह आंकड़ा विरोधाभासी है क्योंकि निर्यात की जाने वाली कुल मात्रा (वॉल्यूम) में वृद्धि देखी गई है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में मिलने वाली कीमतों और विशेष रूप से अफ्रीकी देशों से मांग में कमी ने कुल राजस्व को प्रभावित किया है।
कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) के प्रारंभिक विश्लेषण से संकेत मिलता है कि नाइजीरिया, सेनेगल और आइवरी कोस्ट जैसे प्रमुख अफ्रीकी बाजारों में आर्थिक अस्थिरता और विदेशी मुद्रा भंडार की कमी के कारण भारतीय गैर-बासमती चावल की मांग में कमी आई है। ये देश पारंपरिक रूप से भारतीय चावल के सबसे बड़े खरीदारों में से एक रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन देशों में स्थानीय मुद्रा के अवमूल्यन ने भारतीय आयात को उनके लिए महंगा बना दिया है, जिससे उन्होंने अपनी खरीद को सीमित कर दिया है।
दिलचस्प बात यह है कि भारत सरकार द्वारा हाल के महीनों में निर्यात शुल्क में कटौती और कुछ श्रेणियों पर से प्रतिबंध हटाने के बाद निर्यात की मात्रा में तेजी आई है। इसके बावजूद, प्रति यूनिट मूल्य (Unit Value Realization) में गिरावट आने से भारत के खजाने में आने वाली विदेशी मुद्रा में कमी आई है। वियतनाम और थाईलैंड जैसे प्रतिस्पर्धी देशों द्वारा आक्रामक कीमतों पर चावल की पेशकश भी एक महत्वपूर्ण कारक रही है, जिसने भारतीय निर्यातकों को अपनी कीमतें घटाने पर मजबूर किया है।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय और वहां के व्यापारिक घरानों के लिए यह खबर विशेष महत्व रखती है। ऑस्ट्रेलिया अपनी बासमती और गैर-बासमती चावल की जरूरतों के लिए काफी हद तक भारत पर निर्भर है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में भारतीय किराना स्टोरों पर आपूर्ति और कीमतों का सीधा संबंध भारत की निर्यात नीति और वैश्विक मांग से होता है। यदि निर्यात मूल्य में गिरावट बनी रहती है, तो आने वाले समय में ऑस्ट्रेलियाई बाजारों में चावल की कीमतों में स्थिरता या मामूली कमी देखी जा सकती है, जो वहां के उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात हो सकती है।
निर्यातकों का कहना है कि सरकार को अब नए बाजारों की तलाश करने और मौजूदा बाजारों में मूल्य संवर्धन (Value Addition) पर ध्यान देने की आवश्यकता है। बासमती चावल का प्रदर्शन तुलनात्मक रूप से स्थिर रहा है, लेकिन गैर-बासमती खंड, जो भारतीय निर्यात का एक बड़ा हिस्सा है, वर्तमान में दबाव में है। उद्योग विशेषज्ञों को उम्मीद है कि यदि वैश्विक आर्थिक स्थिति में सुधार होता है और लाल सागर (Red Sea) संकट जैसी लॉजिस्टिक चुनौतियां कम होती हैं, तो वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में स्थिति बेहतर हो सकती है।
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