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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत का 'सभ्यतागत बदलाव': एक वैचारिक पुनर्जागरण

ICN24 Newsroom 14 जून 2026, 09:31 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत का 'सभ्यतागत बदलाव': एक वैचारिक पुनर्जागरण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौट रहा है, जिसे दुनिया एक 'सभ्यतागत बदलाव' के रूप में देख रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यकाल भारतीय राजनीति के इतिहास में केवल नीतिगत बदलावों के लिए ही नहीं, बल्कि भारत की आत्म-छवि में आए एक मौलिक बदलाव के लिए भी याद किया जाएगा। विश्लेषकों का मानना है कि मोदी युग ने भारत को एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य के साथ-साथ एक प्राचीन 'सभ्यतागत राज्य' (Civilizational State) के रूप में पुनर्गठित किया है। यह बदलाव भारत के वैश्विक दृष्टिकोण और उसकी सांस्कृतिक कूटनीति में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। पिछले एक दशक में, भारत ने औपनिवेशिक मानसिकता को त्यागकर अपनी पारंपरिक विरासत को अपनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। योग, आयुर्वेद और भारतीय दर्शन को वैश्विक मंच पर मिली पहचान इसी व्यापक बदलाव का हिस्सा है। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह बदलाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यहाँ के प्रवासी भारतीय अब अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर अधिक मुखर हैं और भारत की बढ़ती सॉफ्ट पावर का प्रभाव सीधे तौर पर महसूस कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया-भारत संबंधों के संदर्भ में, यह 'सभ्यतागत मोड़' द्विपक्षीय सांस्कृतिक आदान-प्रदान को नई मजबूती प्रदान कर रहा है। मेलबर्न, सिडनी और ब्रिस्बेन जैसे शहरों में भारतीय त्योहारों और कलाओं के प्रति बढ़ते सम्मान ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारत अब केवल एक विकासशील अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में, प्रवासी भारतीयों को भारत की विकास गाथा और उसकी सांस्कृतिक विरासत के बीच एक मजबूत सेतु माना गया है। आलोचकों और समर्थकों के बीच इस बात पर बहस जारी है कि क्या यह बदलाव भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को प्रभावित कर रहा है। हालांकि, सरकार का रुख स्पष्ट रहा है कि वे भारत को उसकी जड़ों से जोड़ रहे हैं। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान 'वसुधैव कुटुंबकम' का संदेश, इस सभ्यतागत पुनरुत्थान के प्रमुख प्रतीक बनकर उभरे हैं। अंततः, मोदी युग का मूल्यांकन इस बात से होगा कि उन्होंने भारत की प्राचीन पहचान को आधुनिक लोकतंत्र की आवश्यकताओं के साथ कैसे संतुलित किया है। ऑस्ट्रेलिया जैसे बहुसांस्कृतिक समाज में, भारत की यह नई छवि प्रवासी भारतीयों को अपनी जड़ों से जोड़े रखने और अंतरराष्ट्रीय मंच पर गर्व महसूस कराने का एक प्रमुख कारण बनी हुई है।
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