ऑस्ट्रेलिया
माता-पिता के साथ रहने की सही उम्र क्या है? ऑस्ट्रेलियाई शोध और भारतीय प्रवासियों के बदलते दृष्टिकोण पर एक विशेष रिपोर्ट
ICN24 Newsroom 22 जुल॰ 2026, 08:35 pm

ऑस्ट्रेलियाई शोध के अनुसार 25-27 वर्ष की आयु घर छोड़ने के लिए सही मानी जा रही है, लेकिन भारतीय समुदाय में सांस्कृतिक और आर्थिक कारणों से यह धारणा अलग है।
ऑस्ट्रेलिया में बढ़ती महंगाई और आवास संकट के बीच एक नया शोध सामने आया है जिसने इस पुरानी बहस को फिर से हवा दे दी है कि बच्चों को किस उम्र में अपने माता-पिता का घर छोड़ देना चाहिए। हालिया सर्वेक्षणों के अनुसार, अधिकांश ऑस्ट्रेलियाई मानते हैं कि 25 से 27 वर्ष की आयु वह सीमा है जहाँ बच्चों को स्वतंत्र हो जाना चाहिए। हालांकि, ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह केवल उम्र का आंकड़ा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों और आर्थिक वास्तविकताओं के बीच एक जटिल संतुलन है।
पश्चिमी देशों में 'इंडिविजुअलिज्म' यानी व्यक्तिवाद को काफी महत्व दिया जाता है, जहाँ 18 वर्ष की आयु के बाद बच्चों का घर छोड़ना एक सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है। लेकिन हालिया डेटा बताता है कि ऑस्ट्रेलिया की बदलती अर्थव्यवस्था ने इस धारणा को बदल दिया है। अब औसत ऑस्ट्रेलियाई माता-पिता भी मानते हैं कि मध्य-20 की उम्र तक बच्चों का साथ रहना स्वीकार्य है, विशेषकर तब जब वे पढ़ाई कर रहे हों या घर खरीदने के लिए पैसे बचा रहे हों।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए यह विषय एक अलग ही महत्व रखता है। भारत में बहु-पीढ़ीगत परिवारों (Joint Families) की लंबी परंपरा रही है, जहाँ बच्चों का शादी तक या शादी के बाद भी माता-पिता के साथ रहना न केवल सामान्य है, बल्कि इसे एक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता है। सिडनी और मेलबर्न जैसे महंगे शहरों में रहने वाले भारतीय प्रवासियों के लिए घर पर रहना एक बड़ा आर्थिक लाभ है। यहाँ के रियल एस्टेट बाजार की स्थिति ऐसी है कि एक युवा पेशेवर के लिए अकेले किराया देना या 'डिपोजिट' जमा करना लगभग असंभव होता जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय माता-पिता अक्सर अपने बच्चों को घर पर रखने में गर्व महसूस करते हैं। यह उन्हें न केवल वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है, बल्कि सांस्कृतिक जड़ों से भी जोड़े रखता है। हालांकि, दूसरी तरफ ऑस्ट्रेलिया में पली-बढ़ी भारतीय मूल की युवा पीढ़ी कभी-कभी इस 'अत्यधिक जुड़ाव' के कारण अपनी स्वतंत्रता में कमी महसूस करती है। उनके लिए चुनौती यह है कि वे अपनी भारतीय विरासत और ऑस्ट्रेलियाई समाज की स्वतंत्र जीवनशैली के बीच सामंजस्य कैसे बिठाएं।
निष्कर्ष के तौर पर, 'सही उम्र' अब केवल सामाजिक मानदंडों से तय नहीं होती, बल्कि यह व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर करती है। जहाँ ऑस्ट्रेलियाई समाज धीरे-धीरे बहु-पीढ़ीगत रहने के फायदों को समझ रहा है, वहीं भारतीय समुदाय भी धीरे-धीरे स्वतंत्रता की पश्चिमी अवधारणा को अपना रहा है। अंततः, चाहे वह 25 वर्ष हो या 30, सबसे महत्वपूर्ण यह है कि परिवार के भीतर संवाद बना रहे और आर्थिक सहयोग के साथ-साथ व्यक्तिगत विकास को भी महत्व दिया जाए।
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