राजनीति
अमेरिका में पंडित जी की कमाई कितनी? एक एनआरआई महिला के दावे ने सोशल मीडिया पर छेड़ी नई बहस
ICN24 Newsroom 13 जून 2026, 03:31 pm

सोशल मीडिया पर एक एनआरआई महिला द्वारा अमेरिकी हिंदू पुजारियों की कमाई को लेकर किए गए दावे ने नई बहस छेड़ दी है, जिसमें सालाना करोड़ों की आय की बात कही गई है।
विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदाय के बीच धर्म और संस्कृति को बनाए रखने में हिंदू पुजारियों की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण रही है। हाल ही में सोशल मीडिया पर एक एनआरआई (NRI) महिला द्वारा साझा किए गए वीडियो ने इस बात पर एक नई बहस छेड़ दी है कि अमेरिका में रहने वाले 'पंडित जी' वास्तव में कितना कमाते हैं। इस दावे ने न केवल अमेरिका, बल्कि ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों में रह रहे प्रवासी भारतीयों का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है।
वायरल हो रहे इस वीडियो में महिला ने दावा किया कि अमेरिका में पेशेवर रूप से कर्मकांड करने वाले पंडितों की मांग इतनी अधिक है कि वे सालाना 1,00,000 डॉलर से लेकर 2,00,000 डॉलर (लगभग 80 लाख से 1.6 करोड़ रुपये) तक आसानी से कमा लेते हैं। महिला के अनुसार, गृह प्रवेश, विवाह, और सत्यनारायण कथा जैसे अनुष्ठानों के लिए पंडितों को महीनों पहले बुक करना पड़ता है और उनकी दक्षिणा स्थानीय मानकों के अनुसार काफी ऊंची होती है।
इस दावे के बाद सोशल मीडिया दो गुटों में बंट गया है। कुछ लोगों का मानना है कि यह कमाई उचित है क्योंकि विदेशों में योग्य और प्रशिक्षित पुजारियों की भारी कमी है। इसके अलावा, अमेरिका जैसे देशों में जीवनयापन की लागत (Cost of Living) भी बहुत अधिक है, जिसे देखते हुए यह आय बहुत अधिक नहीं है। वहीं, दूसरी ओर कुछ उपयोगकर्ताओं ने इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया आंकड़ा बताया है। उनके अनुसार, मंदिर में काम करने वाले पुजारियों का वेतन अक्सर एक निश्चित सीमा में होता है और वे पूरी तरह से दान-दक्षिणा पर निर्भर नहीं होते।
ऑस्ट्रेलियाई संदर्भ में देखें तो सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में भी भारतीय समुदाय की बढ़ती आबादी के कारण हिंदू पुजारियों की मांग में भारी उछाल आया है। ऑस्ट्रेलिया में भी पंडितों को प्रति पूजा औसतन 200 से 500 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक दक्षिणा मिलती है। हालांकि, अधिकांश पुजारियों का कहना है कि यह काम केवल पैसे के लिए नहीं है; इसमें वर्षों का धार्मिक प्रशिक्षण और सामुदायिक सेवा का भाव शामिल होता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के वायरल दावे अक्सर पूरी सच्चाई नहीं बताते। अमेरिका में एक स्वतंत्र रूप से काम करने वाले पुजारी और एक मंदिर ट्रस्ट से जुड़े पुजारी की आय में जमीन-आसमान का अंतर हो सकता है। इसके बावजूद, यह चर्चा इस वास्तविकता को उजागर करती है कि पश्चिमी देशों में भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक सेवाओं का बाजारीकरण और महत्व दोनों ही बढ़ रहे हैं। सोशल मीडिया पर छिड़ी यह बहस इस बात का संकेत है कि अब प्रवासी भारतीयों के लिए धर्म और अर्थव्यवस्था के बीच का संतुलन एक दिलचस्प विषय बन गया है।
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