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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: गृहिणियां 'नेशन बिल्डर', उनके काम की कीमत ₹30,000 महीना

ICN24 Newsroom 11 जून 2026, 08:30 pm
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: गृहिणियां 'नेशन बिल्डर', उनके काम की कीमत ₹30,000 महीना

सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों के योगदान को मान्यता देते हुए उनके घरेलू काम की न्यूनतम कीमत 30,000 रुपये प्रति माह तय की है और उन्हें 'राष्ट्र निर्माता' का दर्जा दिया है।

भारत के उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में घरेलू कामकाजी महिलाओं के प्रति समाज और कानून के दृष्टिकोण को बदलने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि सड़क हादसों में जान गंवाने वाली गृहिणियों के मुआवजे की गणना करते समय उनके काम की कीमत कम से कम 30,000 रुपये प्रति माह (3.6 लाख रुपये सालाना) मानी जानी चाहिए। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि घर संभालने वाली महिलाओं को केवल 'होममेकर' नहीं, बल्कि 'नेशन बिल्डर' (राष्ट्र निर्माता) कहा जाना चाहिए। पीठ के अनुसार, एक गृहिणी जिस समर्पण के साथ परिवार की नींव मजबूत करती है, वह किसी भी पेशेवर नौकरी से कम नहीं है। यह फैसला एक मोटर दुर्घटना दावा मामले की सुनवाई के दौरान आया, जहां अदालत ने मुआवजे की राशि बढ़ाने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि यह निर्धारित राशि 'प्रणय सेठी' मामले में तय किए गए अन्य सभी मुआवजा मानकों के अतिरिक्त होगी। अदालत का मानना है कि गृहिणियों द्वारा किए जाने वाले कार्यों का आर्थिक मूल्य अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि वे चौबीसों घंटे बिना किसी छुट्टी के काम करती हैं। उनके योगदान की तुलना किसी पेशेवर से करके उसे कम आंकना अनुचित है। यह फैसला न केवल भारत में रहने वाली महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में रह रहे भारतीय प्रवासियों (Diaspora) के लिए भी एक बड़ा संदेश है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय में अक्सर देखा जाता है कि परिवार के बेहतर भविष्य के लिए महिलाएं करियर छोड़कर घर संभालती हैं। इस फैसले से उनके श्रम के सामाजिक और आर्थिक सम्मान को कानूनी मान्यता मिली है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भविष्य में बीमा दावों और पारिवारिक विवादों में महिलाओं के अधिकारों को मजबूती मिलेगी। अदालत ने अंत में कहा कि एक गृहिणी का काम केवल खाना बनाना या सफाई करना नहीं है, बल्कि वह अगली पीढ़ी को संस्कारित करने और परिवार को भावनात्मक स्थिरता प्रदान करने का कार्य करती है। समाज को उनके इस 'अदृश्य श्रम' को आर्थिक और नैतिक रूप से स्वीकार करना चाहिए।
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