राजनीति
हन्ना आरेंड्ट का दार्शनिक संदेश: क्या नैतिक तटस्थता ही आधुनिक बुराई की जड़ है?
ICN24 Newsroom 13 जून 2026, 08:31 am
प्रसिद्ध राजनीतिक दार्शनिक हन्ना आरेंड्ट का विचार आज के दौर में नैतिक जिम्मेदारी और नागरिक चेतना पर एक नई बहस छेड़ता है।
बीसवीं सदी की प्रख्यात राजनीतिक विचारक हन्ना आरेंड्ट का एक प्रसिद्ध कथन आज के वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक हो गया है। उन्होंने कहा था, "कड़वा सच यह है कि अधिकांश बुराई उन लोगों द्वारा की जाती है जो कभी अच्छे या बुरे होने का मन ही नहीं बना पाते।" आरेंड्ट का यह विचार केवल इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आज के आधुनिक समाज, विशेषकर प्रवासी समुदायों के लिए एक गहरे आत्मचिंतन का विषय है।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के संदर्भ में, यह विचार नागरिक भागीदारी और नैतिक स्पष्टता की आवश्यकता पर जोर देता है। एक जीवंत लोकतंत्र में, 'तटस्थ' रहना अक्सर उन व्यवस्थाओं को बढ़ावा देता है जो समाज के लिए हानिकारक हो सकती हैं। आरेंड्ट का तर्क था कि बुराई हमेशा क्रूर इरादों से नहीं उपजती, बल्कि यह अक्सर उन लोगों की निष्क्रियता का परिणाम होती है जो सही और गलत के बीच चुनाव करने से कतराते हैं।
ऐतिहासिक रूप से, आरेंड्ट ने 'बैनैलिटी ऑफ ईविल' (बुराई की तुच्छता) की अवधारणा पेश की थी। उनका मानना था कि समाज में बड़ी तबाही अक्सर उन 'साधारण' लोगों द्वारा मचाई जाती है जो बिना किसी सवाल के आदेशों का पालन करते हैं या अपनी नैतिक जिम्मेदारी को पहचानने से इनकार कर देते हैं। ऑस्ट्रेलिया जैसे बहुसांस्कृतिक समाज में, जहां नीतिगत निर्णय और सामाजिक न्याय हर नागरिक के जीवन को प्रभावित करते हैं, वहां 'मौन' रहना या किसी पक्ष को न चुनना भी एक तरह का राजनीतिक चुनाव ही है।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए, जो व्यापार, शिक्षा और राजनीति में तेजी से अपनी पहचान बना रहा है, यह दार्शनिक दृष्टिकोण एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। यह संदेश है—सक्रिय नागरिकता। जब हम सामुदायिक नेतृत्व या नीति-निर्माण की बात करते हैं, तो नैतिक स्पष्टता का होना अनिवार्य है। यदि पढ़े-लिखे और सक्षम लोग नैतिक स्टैंड लेने से बचते हैं, तो वे अनजाने में ही गलत प्रवृत्तियों को फलने-फूलने का अवसर प्रदान करते हैं।
अंततः, आरेंड्ट का यह उद्धरण हमें यह सिखाता है कि अच्छाई की राह पर चलना एक सचेत निर्णय है। यह केवल बुराई न करने के बारे में नहीं है, बल्कि सक्रिय रूप से अच्छे का चयन करने और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के बारे में है। वर्तमान समय में, जब दुनिया ध्रुवीकरण और जटिल चुनौतियों से जूझ रही है, तब 'मन न बना पाना' किसी भी सभ्य समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित हो सकता है।
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