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सोमनाथ से अयोध्या: राम मंदिर ट्रस्ट पर चंदा चोरी के आरोप और ऐतिहासिक लूट पर छिड़ी बहस

ICN24 Newsroom 6 जुल॰ 2026, 01:31 pm
सोमनाथ से अयोध्या: राम मंदिर ट्रस्ट पर चंदा चोरी के आरोप और ऐतिहासिक लूट पर छिड़ी बहस

अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट पर लगे चंदा चोरी के आरोपों के बीच लेखक राम पुनियानी ने ऐतिहासिक लूट और वर्तमान राजनीति के अंतर्संबंधों पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के साथ ही 'श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' पर लगे वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता राम पुनियानी ने इन आरोपों का विश्लेषण करते हुए इसे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश की है। उन्होंने सोमनाथ मंदिर से लेकर अयोध्या तक के सफर में मंदिरों की संपत्ति और उन पर होने वाली 'लूट' के नैरेटिव पर गंभीर सवाल उठाए हैं। हालिया विवाद मुख्य रूप से मंदिर ट्रस्ट द्वारा खरीदी गई जमीन के सौदों पर आधारित है। आरोप है कि कुछ जमीनें कौड़ियों के दाम पर खरीदी गईं और महज कुछ ही मिनटों बाद ट्रस्ट को करोड़ों रुपये के ऊंचे दामों पर बेच दी गईं। राम पुनियानी का तर्क है कि जहां ऐतिहासिक रूप से मंदिरों की लूट को केवल धार्मिक विद्वेष के रूप में देखा जाता है, वहीं वर्तमान में धर्म के नाम पर होने वाले चंदे के प्रबंधन में पारदर्शिता का अभाव एक आधुनिक चुनौती बनकर उभरा है। पुनियानी के अनुसार, सोमनाथ मंदिर की लूट का इतिहास अक्सर राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए उपयोग किया जाता है। हालांकि, वे यह रेखांकित करते हैं कि मध्यकालीन दौर में मंदिरों पर हमले अक्सर उनकी अथाह संपत्ति के कारण होते थे। अब अयोध्या के संदर्भ में, जब लाखों श्रद्धालुओं—जिनमें ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में रहने वाले अप्रवासी भारतीय भी शामिल हैं—ने अपनी गाढ़ी कमाई का दान दिया है, तो ट्रस्ट की जवाबदेही और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह मुद्दा विशेष महत्व रखता है। सिडनी, मेलबर्न और ब्रिस्बेन जैसे शहरों में आयोजित 'निधि समर्पण अभियान' के दौरान प्रवासी भारतीयों ने बढ़-चढ़कर दान दिया था। सामुदायिक नेताओं का मानना है कि आस्था के इन केंद्रों में वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करना न केवल कानूनी आवश्यकता है, बल्कि उन करोड़ों भक्तों के विश्वास को बनाए रखने के लिए भी अनिवार्य है जिन्होंने अपनी संस्कृति से जुड़े रहने के लिए यह योगदान दिया। अंततः, यह विवाद केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। यह धर्म, सत्ता और धन के उस जटिल जाल को दर्शाता है जो अक्सर बड़े धार्मिक संस्थानों के इर्द-गिर्द बुना जाता है। पुनियानी का विश्लेषण यह सुझाव देता है कि जब तक धार्मिक न्यासों में पूर्ण पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही नहीं होगी, तब तक 'ऐतिहासिक लूट' और 'आधुनिक भ्रष्टाचार' के बीच की बहस बनी रहेगी। निष्पक्ष जांच ही इस पूरे मामले में दूध का दूध और पानी का पानी कर सकती है।
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