राजनीति
भारत में विदेशी फंडिंग नियम नए नहीं: इतालवी विशेषज्ञ ने की FCRA के इतिहास और पारदर्शिता की व्याख्या
ICN24 Newsroom 13 अग॰ 2026, 09:37 am

भारत-इटली संबंधों के विशेषज्ञ कार्लो लोम्बार्डी का कहना है कि विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) कोई नया प्रतिबंध नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने का एक पुराना साधन है।
नई दिल्ली और सिडनी के बीच कूटनीतिक और आर्थिक संबंधों के विस्तार के बीच, भारत में विदेशी फंडिंग को लेकर जारी बहस एक बार फिर चर्चा में है। भारत-इटली संबंधों के जाने-माने विशेषज्ञ कार्लो लोम्बार्डी ने हाल ही में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) के ऐतिहासिक संदर्भ और इसकी आवश्यकता पर प्रकाश डाला है। लोम्बार्डी के अनुसार, भारत में विदेशी धन के प्रवाह को विनियमित करने वाले कानून कोई नई घटना नहीं हैं, बल्कि वे दशकों से भारतीय कानून व्यवस्था का हिस्सा रहे हैं।
लोम्बार्डी ने स्पष्ट किया कि FCRA की जड़ें 1970 के दशक में, विशेष रूप से 1976 में आपातकाल के दौरान देखी जा सकती हैं। उस समय, विदेशी हस्तक्षेप को रोकने और राष्ट्रीय राजनीति में विदेशी धन के प्रभाव को कम करने के लिए यह कानून लाया गया था। इसके बाद, 2010 और फिर 2020 में इसमें महत्वपूर्ण संशोधन किए गए ताकि बदलती वैश्विक परिस्थितियों और वित्तीय प्रौद्योगिकियों के अनुरूप पारदर्शिता को बढ़ाया जा सके। विशेषज्ञ का तर्क है कि सरकार का प्राथमिक उद्देश्य धन के स्रोत को ट्रैक करना और यह सुनिश्चित करना है कि इसका उपयोग उसी उद्देश्य के लिए हो जिसके लिए इसे प्राप्त किया गया है।
पारदर्शिता की आवश्यकता पर जोर देते हुए, लोम्बार्डी ने कहा कि किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए यह जानना अनिवार्य है कि अंतरराष्ट्रीय धन उसकी सीमाओं के भीतर कहां से आ रहा है और कहां खर्च हो रहा है। उन्होंने बताया कि कई बार अंतरराष्ट्रीय फंडों का दुरुपयोग उन गतिविधियों के लिए किया जाता है जो देश के सामाजिक ढांचे या सुरक्षा के लिए हानिकारक हो सकती हैं। ऐसे में, सख्त निगरानी रखना किसी भी सरकार की जिम्मेदारी बन जाती है। यह केवल भारत तक सीमित नहीं है; कई यूरोपीय और पश्चिमी देश भी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इसी तरह के नियामक ढांचे का उपयोग करते हैं।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए यह जानकारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले हजारों प्रवासी भारतीय (NRIs) और ओसीआई (OCI) कार्ड धारक अक्सर भारत में विभिन्न सामाजिक और धार्मिक कार्यों के लिए दान देते हैं। लोम्बार्डी के विश्लेषण के अनुसार, दानदाताओं को यह समझना चाहिए कि जब वे भारत में किसी गैर-सरकारी संगठन (NGO) को धन भेजते हैं, तो उस संस्था के पास वैध FCRA लाइसेंस होना अनिवार्य है। नियमों का पालन न करने वाली संस्थाओं को धन भेजना न केवल कानूनी जटिलताएं पैदा कर सकता है, बल्कि यह परोपकारी कार्यों के वास्तविक उद्देश्य को भी विफल कर सकता है।
अंत में, इतालवी विशेषज्ञ ने निष्कर्ष निकाला कि हालांकि नियमों के कार्यान्वयन में कुछ प्रशासनिक चुनौतियां हो सकती हैं, लेकिन इन नियमों के पीछे का मूल विचार—यानी जवाबदेही और पारदर्शिता—लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए आवश्यक है। उन्होंने सुझाव दिया कि भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के बीच नागरिक समाज के सहयोग को बढ़ाने के लिए इन नियमों के बारे में सही जानकारी का प्रसार होना चाहिए ताकि सद्भावनापूर्ण दान बिना किसी बाधा के सही गंतव्य तक पहुंच सके।
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