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एक्सप्लेन: व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में भारत का नाम क्यों? ट्रांसशिपमेंट विवाद और इसके असर को समझें

ICN24 Newsroom 17 अग॰ 2026, 02:39 pm
एक्सप्लेन: व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में भारत का नाम क्यों? ट्रांसशिपमेंट विवाद और इसके असर को समझें

व्हाइट हाउस की ताजा रिपोर्ट में भारत समेत 40 देशों पर चीनी सामानों को अमेरिकी टैरिफ से बचाने के लिए 'ट्रांस-शिपमेंट' नेटवर्क का हिस्सा होने का आरोप लगाया गया है।

व्हाइट हाउस ने 'द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम: राइज, स्कोप, एंड कॉस्ट्स' शीर्षक से एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है, जिसने अंतरराष्ट्रीय व्यापार गलियारों में हलचल मचा दी है। इस 25 पन्नों की रिपोर्ट में भारत सहित दुनिया के 40 देशों पर आरोप लगाया गया है कि वे एक 'शैडो ट्रांस-शिपमेंट नेटवर्क' के जरिए चीनी निर्यातकों को अमेरिकी टैरिफ से बचने में मदद कर रहे हैं। पीटर नवारो के नेतृत्व में व्हाइट हाउस के 'ऑफिस ऑफ ट्रेड एंड मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी' द्वारा तैयार यह रिपोर्ट 2018 में चीन के खिलाफ लागू किए गए 'सेक्शन 301' टैरिफ के बाद उभरे नए व्यापारिक रास्तों की ओर इशारा करती है। रिपोर्ट का मुख्य तर्क यह है कि चीनी उत्पाद सीधे अमेरिका भेजने के बजाय उन देशों में भेजे जाते हैं जहां अमेरिकी टैरिफ दरें कम हैं। वहां इन उत्पादों की री-पैकेजिंग की जाती है, नए इनवॉइस बनाए जाते हैं या उन पर नाममात्र की प्रोसेसिंग की जाती है ताकि उन्हें उस देश का उत्पाद बताकर अमेरिका भेजा जा सके। व्हाइट हाउस का अनुमान है कि इस तरीके से 2025 में लगभग 67 अरब डॉलर का चीनी सामान अमेरिकी बाजार में पहुंच सकता है, जिससे अमेरिकी राजस्व को भारी नुकसान हो रहा है। भारत का नाम इस सूची में आना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में 'मेक इन इंडिया' और 'प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव' (PLI) स्कीम के तहत भारत एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में उभरा है। रिपोर्ट में विशेष रूप से किसी भारतीय कंपनी का नाम नहीं लिया गया है, लेकिन यह संकेत दिया गया है कि कुछ चीनी उत्पाद सीमित प्रोसेसिंग के बाद भारत के रास्ते अमेरिका पहुंच रहे हैं। हालांकि, भारतीय व्यापार विशेषज्ञों और 'ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव' (GTRI) का मानना है कि किसी उत्पाद में चीनी पुर्जों का होना उसे अवैध नहीं बनाता, क्योंकि आज की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय, विशेषकर वे जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार और लॉजिस्टिक्स से जुड़े हैं, के लिए यह खबर महत्वपूर्ण है। अमेरिका द्वारा 'रूल्स ऑफ ओरिजिन' (उत्पाद के मूल स्थान के नियम) को सख्त किए जाने से भारतीय निर्यातकों पर अनुपालन का बोझ बढ़ सकता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और इंजीनियरिंग गुड्स जैसे क्षेत्रों में अब भारतीय कंपनियों को अधिक कड़े दस्तावेजी प्रमाण देने पड़ सकते हैं कि उनके उत्पादों का अधिकांश निर्माण वास्तव में भारत में ही हुआ है। विशेषज्ञों की राय है कि भारत को इस स्थिति से निपटने के लिए अपनी सीमा शुल्क सत्यापन प्रणाली (Customs Verification System) को और मजबूत करना चाहिए। हालांकि इस रिपोर्ट से अल्पकालिक नियामक चुनौतियां बढ़ सकती हैं, लेकिन जानकारों का मानना है कि इससे भारत-अमेरिका के व्यापक रणनीतिक संबंधों पर बड़ा असर पड़ने की संभावना कम है। वाशिंगटन अभी भी चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए भारत को एक भरोसेमंद आर्थिक साझेदार के रूप में देखता है।
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