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डॉ. जिहाद: पर्थ के एक सफल डॉक्टर का 'पार्टी बॉय' से खूंखार आतंकी बनने तक का सफर

ICN24 Newsroom 22 जुल॰ 2026, 09:35 pm
डॉ. जिहाद: पर्थ के एक सफल डॉक्टर का 'पार्टी बॉय' से खूंखार आतंकी बनने तक का सफर

पर्थ के एक सम्मानित बाल रोग विशेषज्ञ तारेक कमलेह की कहानी, जिन्होंने अपनी सफल मेडिकल करियर छोड़कर इस्लामिक स्टेट का रास्ता चुना।

ऑस्ट्रेलियाई सुरक्षा एजेंसियों और समाज के लिए पर्थ के डॉक्टर तारेक कमलेह का मामला आज भी एक गंभीर चेतावनी बना हुआ है। कमलेह, जिन्हें कभी उनके साथी एक 'पार्टी बॉय' और एक प्रतिभावान चिकित्सक के रूप में जानते थे, अचानक कट्टरपंथ की राह पर चल पड़े और 'डॉक्टर जिहाद' के नाम से कुख्यात हो गए। उनकी यह कहानी न केवल उनके व्यक्तिगत पतन को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि कैसे डिजिटल युग में कट्टरपंथ किसी को भी अपनी चपेट में ले सकता है। पर्थ में जन्मे और पले-बढ़े तारेक कमलेह के पिता फिलिस्तीनी और मां जर्मन थीं। उन्होंने एडिलेड विश्वविद्यालय से मेडिकल की पढ़ाई पूरी की और पर्थ और एडिलेड के प्रमुख अस्पतालों में एक सम्मानित बाल रोग विशेषज्ञ (पीडियाट्रिशियन) के रूप में काम किया। उनके पुराने दोस्तों और सहकर्मियों का कहना है कि कमलेह कभी भी एक धार्मिक व्यक्ति नहीं थे। वह एक आधुनिक, पश्चिमी जीवनशैली जीते थे, जिसमें पार्टियां और मेल-जोल शामिल था। उनके व्यवहार में ऐसा कुछ भी नहीं था जो यह संकेत दे कि वे आगे चलकर एक आतंकवादी संगठन के पोस्टर बॉय बन जाएंगे। साल 2015 में अचानक उनकी खबर तब आई जब वे सीरिया चले गए और वहां इस्लामिक स्टेट (ISIS) के एक प्रोपेगेंडा वीडियो में नजर आए। वीडियो में उन्हें नीले रंग के मेडिकल गाउन में देखा गया, जहां वे अन्य मुस्लिम डॉक्टरों को आईएसआईएस के कब्जे वाले इलाकों में आकर काम करने के लिए उकसा रहे थे। उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई सरकार और पश्चिमी मूल्यों के खिलाफ कड़ी बयानबाजी की और स्पष्ट किया कि वे अब कभी ऑस्ट्रेलिया नहीं लौटेंगे। उनकी इस घोषणा ने ऑस्ट्रेलियाई चिकित्सा समुदाय और भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई प्रवासियों को स्तब्ध कर दिया। ऑस्ट्रेलियाई संघीय पुलिस (AFP) ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया और मेडिकल बोर्ड ने उनका लाइसेंस रद्द कर दिया। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि कमलेह का इस्तेमाल आईएसआईएस द्वारा एक 'शिक्षित चेहरे' के रूप में किया गया था ताकि पश्चिमी देशों के अन्य पेशेवरों को लुभाया जा सके। रिपोर्टों के अनुसार, 2018 में सीरिया के रक्का में एक हवाई हमले के दौरान उनकी मृत्यु हो गई, जिसकी पुष्टि बाद में आतंकी समूहों ने भी की। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए यह मामला एक महत्वपूर्ण सबक है। ऑस्ट्रेलिया जैसे बहुसांस्कृतिक समाज में, जहां प्रवासी अपने बच्चों के लिए उज्ज्वल भविष्य और शिक्षा का सपना देखते हैं, कट्टरपंथ की घुसपैठ चिंता का विषय है। विशेषज्ञों का कहना है कि कट्टरपंथ केवल हाशिए पर रहने वाले लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उच्च शिक्षित पेशेवरों को भी निशाना बना सकता है। यह मामला परिवारों को सतर्क रहने और सामुदायिक संवाद को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर देता है ताकि युवाओं को ऐसी विनाशकारी विचारधाराओं से बचाया जा सके।
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