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‘दिमागी नक्सली’: प्रधानमंत्री मोदी की लाल किले से चेतावनी पर छिड़ा राजनीतिक विवाद
ICN24 Newsroom 16 अग॰ 2026, 01:38 pm
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से ‘दिमागी नक्सलियों’ के खिलाफ आगाह किया है, जिसे लेकर विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
भारत के 78वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में एक नया शब्द ‘दिमागी नक्सली’ (वैचारिक नक्सलवाद) उछालकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। प्रधानमंत्री ने दावा किया कि जहां एक ओर सशस्त्र नक्सलवाद अपने खात्मे की ओर है, वहीं दूसरी ओर वैचारिक स्तर पर सक्रिय ‘दिमागी नक्सली’ देश की प्रगति और एकता के लिए एक गंभीर खतरा बनकर उभर रहे हैं। उनके इस बयान ने भारतीय राजनीति में हलचल तेज कर दी है और विपक्षी दलों ने इसे सरकार की आलोचना करने वालों को दबाने की कोशिश करार दिया है।
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में विस्तार से बताया कि पिछले एक दशक में सरकार के प्रयासों के कारण वामपंथी उग्रवाद (LWE) से प्रभावित जिलों की संख्या में भारी कमी आई है। उन्होंने कहा कि बंदूक उठाने वाले नक्सली अब मुख्यधारा में लौट रहे हैं, लेकिन एक नया वर्ग पैदा हो गया है जो कलम और विचारधारा के माध्यम से युवाओं के दिमाग में जहर घोलने का काम कर रहा है। पीएम मोदी के अनुसार, ये तत्व विकास कार्यों में बाधा डालते हैं और समाज को जाति एवं संप्रदाय के आधार पर विभाजित करने की साजिश रचते हैं।
प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी पर पलटवार करते हुए कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने इसे अलोकतांत्रिक बताया है। विपक्ष का तर्क है कि 'अर्बन नक्सल' के बाद अब 'दिमागी नक्सल' जैसे शब्दों का इस्तेमाल उन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और शिक्षाविदों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है जो सरकार की नीतियों से असहमत हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री को देश की बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर बात करनी चाहिए थी, न कि राजनीतिक विरोधियों को नए-नए लेबल देकर बदनाम करना चाहिए।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए भी यह मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में बसे प्रवासी भारतीय भारत की आंतरिक सुरक्षा और लोकतांत्रिक स्थिरता को लेकर काफी संवेदनशील रहते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में जब भी इस तरह की वैचारिक ध्रुवीकरण वाली बयानबाजी होती है, उसका असर प्रवासी समुदायों के बीच होने वाली चर्चाओं पर भी पड़ता है। भारतीय मूल के कई लोग इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से सही मान रहे हैं, जबकि अन्य इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रहार के रूप में देख रहे हैं।
सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि पीएम मोदी का यह बयान गृह मंत्रालय की उस रणनीति का हिस्सा हो सकता है जिसमें केवल भौतिक हिंसा ही नहीं, बल्कि उस उग्रवादी सोच को भी खत्म करने पर जोर दिया जा रहा है जो कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बनती है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर सड़कों तक गर्म रहने की उम्मीद है, क्योंकि सरकार अब अपनी इस परिभाषा को प्रशासनिक नीतियों में भी ढालने की तैयारी में दिख रही है।
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