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चेक बाउंस मामला: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, हस्ताक्षर स्वीकार करने के बाद रद्द नहीं होगी शिकायत
ICN24 Newsroom 6 जून 2026, 08:30 am

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार कर लिए गए हों, तो जबरदस्ती के दावों के आधार पर केस रद्द नहीं किया जा सकता।
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने चेक बाउंस (Cheque Bounce) के मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल कायम की है। न्यायालय ने 'अतुल विग बनाम हनी सिंह आहलूवालिया' मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट (NI Act) की धारा 138 के तहत दर्ज शिकायत को केवल इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता कि आरोपी ने चेक 'दबाव या जबरदस्ती' में जारी करने का दावा किया है।
न्यायमूर्ति की पीठ ने यह फैसला भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 (जो पूर्ववर्ती CrPC की धारा 482 के समान है) के तहत दायर एक याचिका पर दिया। अदालत ने कहा कि एक बार जब आरोपी चेक पर अपने हस्ताक्षर स्वीकार कर लेता है, तो कानून के तहत यह माना जाता है कि चेक किसी कर्ज या कानूनी देनदारी को चुकाने के लिए जारी किया गया था। इस धारणा को केवल मुकदमे (Trial) के दौरान सबूतों के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है।
इस मामले में याचिकाकर्ता अतुल विग ने दलील दी थी कि विपक्षी पार्टी ने उनके साथ धोखाधड़ी की और उन पर दबाव डालकर चेक पर हस्ताक्षर कराए थे। हालांकि, अदालत ने इन तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि 'जबरदस्ती' या 'धमकी' जैसे दावे तथ्य के विवादित प्रश्न (Disputed questions of fact) हैं। ऐसे दावों की सत्यता की जांच केवल निचली अदालत में गवाहों के बयानों और जिरह के जरिए ही संभव है, न कि उच्च न्यायालय द्वारा प्रारंभिक स्तर पर मामले को रद्द करके।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो तकनीकी आधार पर चेक बाउंस के मुकदमों से बचना चाहते हैं। भारतीय कानून में चेक की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए सख्त प्रावधान हैं। यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि उससे जबरन चेक लिखवाया गया है, तो उसे कोर्ट में यह साबित करना होगा कि उसने समय रहते पुलिस में इसकी शिकायत क्यों नहीं की या चेक को 'स्टॉप पेमेंट' क्यों नहीं कराया।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय प्रवासियों (NRIs) के लिए भी यह फैसला काफी महत्वपूर्ण है। कई प्रवासी भारतीय भारत में संपत्ति लेनदेन या व्यावसायिक समझौतों के लिए चेक का उपयोग करते हैं। अक्सर देखा गया है कि विवाद होने पर एक पक्ष चेक बाउंस की कार्यवाही को रोकने के लिए उच्च न्यायालय का रुख करता है। इस फैसले के बाद, अब ऐसे मामलों में मुकदमे का सामना करना अनिवार्य होगा, जिससे लेन-देन में पारदर्शिता बढ़ेगी।
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