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कावेरी जल विवाद: तमिलनाडु और कर्नाटक फिर आमने-सामने, मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

ICN24 Newsroom 2 अग॰ 2026, 07:36 pm
कावेरी जल विवाद: तमिलनाडु और कर्नाटक फिर आमने-सामने, मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

मानसून की कमी और पानी के बंटवारे को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच पुराना विवाद फिर गहरा गया है, जिससे मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर है।

भारत के दक्षिण राज्यों, तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच कावेरी नदी के जल बंटवारे को लेकर चल रहा दशकों पुराना विवाद एक बार फिर उग्र हो गया है। इस बार विवाद की जड़ में मानसून के दौरान हुई कम वर्षा है, जिसने दोनों राज्यों के बीच तनाव को चरम पर पहुंचा दिया है। कर्नाटक सरकार ने अपने जलाशयों में पानी की कमी का हवाला देते हुए तमिलनाडु को पानी छोड़ने से साफ इनकार कर दिया है, जिसके जवाब में तमिलनाडु सरकार ने न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। तमिलनाडु का तर्क है कि उसे अपने कृषि क्षेत्र, विशेष रूप से 'कुरुवई' फसल को बचाने के लिए कावेरी के पानी के अपने वैध हिस्से की तत्काल आवश्यकता है। राज्य सरकार के अनुसार, कर्नाटक को कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए। दूसरी ओर, कर्नाटक का कहना है कि कम वर्षा के कारण उसके अपने शहरों, विशेष रूप से बेंगलुरु जैसे महानगरों में पीने के पानी का संकट पैदा हो सकता है। कर्नाटक सरकार का रुख है कि जब संकट की स्थिति हो, तो पानी का बंटवारा सामान्य वर्षों के फॉर्मूले के आधार पर नहीं किया जा सकता। इस विवाद ने तमिलनाडु की राजनीति में भी नई हलचल पैदा कर दी है। हाल ही में सक्रिय राजनीति में कदम रखने वाले लोकप्रिय अभिनेता और 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) के प्रमुख थलपति विजय के लिए यह एक बड़ी अग्निपरीक्षा साबित हो रही है। विपक्षी दल और आलोचक इस संवेदनशील मुद्दे पर उनकी भूमिका और रुख को लेकर सवाल उठा रहे हैं। वहीं, राज्य की सत्ताधारी पार्टी डीएमके (DMK) इस मुद्दे पर केंद्र सरकार और न्यायपालिका के माध्यम से दबाव बनाने की कोशिश कर रही है ताकि किसानों के हितों की रक्षा की जा सके। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय, विशेष रूप से तमिलनाडु और कर्नाटक से ताल्लुक रखने वाले प्रवासियों के लिए यह खबर चिंता का विषय है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में रहने वाले कई प्रवासी परिवार आज भी अपने पैतृक गांवों में कृषि से जुड़े हुए हैं। जल संकट का सीधा असर उनकी पारिवारिक आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के बीच इस तरह के क्षेत्रीय विवाद अक्सर चर्चा का विषय बनते हैं, क्योंकि यह न केवल राजनीति बल्कि पर्यावरण और संसाधनों के प्रबंधन की वैश्विक चुनौती को भी दर्शाता है। फिलहाल, सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत को यह तय करना होगा कि पानी की कमी वाले साल में 'डिस्ट्रेस शेयरिंग' (संकटकालीन बंटवारा) का फॉर्मूला क्या होना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक दोनों राज्य तकनीक और जल संरक्षण के स्थायी समाधानों पर सहमत नहीं होते, तब तक हर कम बारिश वाले साल में यह विवाद इसी तरह सिर उठाता रहेगा। इस विवाद का समाधान न केवल कानूनी है, बल्कि इसमें कूटनीतिक और मानवीय दृष्टिकोण की भी उतनी ही आवश्यकता है।
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