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धरती आबा बिरसा मुंडा: जब जंगल के 'उलगुलान' से कांप उठी थी ब्रिटिश हुकूमत

ICN24 Newsroom 9 जून 2026, 01:30 pm
धरती आबा बिरसा मुंडा: जब जंगल के 'उलगुलान' से कांप उठी थी ब्रिटिश हुकूमत

आदिवासी नायक बिरसा मुंडा की शहादत और जलियांवाला बाग जैसी बर्बरता की अनकही कहानी, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदल दी।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने बहुत कम आयु में ही साम्राज्यवादी ताकतों की नींव हिला दी थी। इनमें सबसे प्रमुख नाम 'धरती आबा' बिरसा मुंडा का है। झारखंड की पहाड़ियों से शुरू हुआ उनका 'उलगुलान' (महान विद्रोह) केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए एक ऐसी हुंकार थी, जिसने ब्रिटिश हुकूमत को रक्षात्मक होने पर मजबूर कर दिया था। मात्र 25 वर्ष की आयु में उनकी शहादत ने आदिवासी अस्मिता को वैश्विक पहचान दी। 1890 के दशक के अंत में बिरसा मुंडा ने मुंडा आदिवासियों को संगठित करना शुरू किया। उन्होंने न केवल अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला, बल्कि उन साहूकारों और जमींदारों के विरुद्ध भी आवाज उठाई जो आदिवासियों का शोषण कर रहे थे। उन्होंने एक नए धार्मिक विश्वास की नींव रखी और अपने अनुयायियों को अंधविश्वास त्यागकर अपनी जड़ों की ओर लौटने का आह्वान किया। उनके नेतृत्व में शुरू हुआ यह विद्रोह इतिहास में 'उलगुलान' के नाम से दर्ज हुआ। इतिहासकारों के अनुसार, बिरसा मुंडा के आंदोलन का एक सबसे वीभत्स अध्याय डोंबारी पहाड़ियों की घटना है। इसे 'झारखंड का जलियांवाला बाग' कहा जाता है। जनवरी 1899 में, जब बिरसा मुंडा अपने समर्थकों के साथ सभा कर रहे थे, तब ब्रिटिश सेना ने पहाड़ियों को घेर लिया और निहत्थे आदिवासियों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं। इस नरसंहार में सैकड़ों आदिवासी शहीद हुए, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। यह घटना जलियांवाला बाग कांड से लगभग दो दशक पहले हुई थी, लेकिन इतिहास के पन्नों में इसे वह स्थान नहीं मिला जो इसे मिलना चाहिए था। बिरसा मुंडा को अंततः गिरफ्तार कर लिया गया और 9 जून 1900 को रांची जेल में संदेहास्पद परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। सरकार ने उनकी मृत्यु का कारण हैजा बताया, लेकिन लोक मान्यताओं में यह माना जाता है कि उन्हें जेल में धीमा जहर दिया गया था। आज, ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए बिरसा मुंडा का जीवन नेतृत्व और अधिकारों के प्रति जागरूकता का प्रतीक है। विशेष रूप से प्रवासी भारतीय युवा, जो अपनी जड़ों से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए बिरसा मुंडा का संघर्ष सामाजिक न्याय और अपनी संस्कृति के संरक्षण की एक बड़ी प्रेरणा है। बिरसा मुंडा की विरासत आज भी जीवित है। भारत सरकार ने उनकी जयंती को 'जनजातीय गौरव दिवस' के रूप में घोषित किया है। उनका नारा 'महारानी राज तुंदु जाना, अबुआ राज एते जाना' (महारानी का राज खत्म हो और हमारा राज स्थापित हो) आज भी आदिवासी अधिकारों के संघर्ष का मूल मंत्र बना हुआ है। उनकी शहादत की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता की कीमत कितनी भारी थी।
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