ऑस्ट्रेलिया
बाइपोलर डिसऑर्डर के इलाज में डिजिटल टूल्स का बढ़ता उपयोग: विशेषज्ञों ने आंकड़ों की सटीकता पर जताई चिंता
ICN24 Newsroom 21 अग॰ 2026, 01:37 am
बाइपोलर डिसऑर्डर के उपचार के लिए विकसित 'U-REACH' प्रोजेक्ट पर विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने डेटा की विश्वसनीयता और उपचार निर्णयों में मानवीय परामर्श के महत्व पर जोर दिया है।
मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में 'बाइपोलर डिसऑर्डर' (Bipolar Disorder) एक जटिल स्थिति है, जिसके प्रबंधन के लिए चिकित्सा जगत लगातार नई तकनीकें विकसित कर रहा है। हाल ही में, विशेषज्ञों ने 'एविडेंस-बेस्ड इंटरवेंशन फॉर बाइपोलर डिसऑर्डर' (U-REACH) प्रोजेक्ट की समीक्षा करते हुए महत्वपूर्ण सावधानी बरतने की सलाह दी है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल (BMJ) में प्रकाशित एक प्रतिक्रिया में, चीन के यानताई युहुआंगडिंग अस्पताल के शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि हालांकि यह डिजिटल प्लेटफॉर्म एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इसके डेटा और रैंकिंग के आधार पर इलाज के निर्णय लेने में जोखिम हो सकता है।
U-REACH प्रोजेक्ट का उद्देश्य 2,510 मेटा-एनालिटिक अनुमानों को एक ओपन-एक्सेस प्लेटफॉर्म में बदलना है, ताकि डॉक्टरों और मरीजों को इलाज के बेहतर विकल्प चुनने में मदद मिल सके। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्लेटफॉर्म में इस्तेमाल किए गए आंकड़ों की गुणवत्ता में भिन्नता है। समीक्षा में पाया गया कि शामिल किए गए 77 विश्लेषणों में से 53 की गुणवत्ता काफी कम थी। शोधकर्ताओं के अनुसार, यदि आंकड़ों की गुणवत्ता सही नहीं है, तो 'हाई-सर्टेन्टी' (उच्च निश्चितता) का संकेत मरीजों और डॉक्टरों को भ्रमित कर सकता है।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए यह खबर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले प्रवासी भारतीय अक्सर मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग करते समय भाषा और सांस्कृतिक बाधाओं का सामना करते हैं। ऐसे में डिजिटल टूल्स पर बढ़ती निर्भरता फायदेमंद तो हो सकती है, लेकिन आंकड़ों की कमी उपचार में बाधा बन सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, प्लेटफॉर्म के सुरक्षा मैट्रिक्स में लगभग 40 प्रतिशत डेटा अन्य आबादी या नैदानिक सर्वसम्मति से लिया गया है, न कि सीधे बाइपोलर डिसऑर्डर के मरीजों के वास्तविक नैदानिक परीक्षणों से।
विशेषज्ञों ने तीन प्रमुख सुरक्षा उपायों का सुझाव दिया है। पहला, अध्ययन की गुणवत्ता और उसके परिणामों की निश्चितता को स्पष्ट रूप से अलग दिखाया जाना चाहिए। दूसरा, सुरक्षा संबंधी आंकड़ों में जहां भी अनुमानों का उपयोग किया गया है, उसे स्पष्ट रूप से लेबल किया जाना चाहिए। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि व्यक्तिगत रैंकिंग को सीधे साझा निर्णय (Shared Decision Making) के बराबर नहीं माना जाना चाहिए। इलाज का चुनाव केवल डेटा पर नहीं, बल्कि दवा की लागत, प्रजनन संबंधी चिंताओं, मरीज की जीवनशैली और अन्य बीमारियों पर भी निर्भर करता है।
ऑस्ट्रेलिया में भारतीय प्रवासियों के बीच मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सामाजिक संकोच (stigma) आज भी एक बड़ी चुनौती है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल साक्षरता की कमी वाले मरीजों के लिए ये टूल्स और भी जटिल हो सकते हैं। शोधकर्ताओं ने अंत में कहा कि U-REACH जैसे प्लेटफॉर्म भविष्य के लिए एक मजबूत आधार हैं, लेकिन नैदानिक सटीकता और मानवीय परामर्श के बिना इन्हें अंतिम उपचार सिफारिश नहीं माना जाना चाहिए। सटीक और सुरक्षित उपचार के लिए मरीजों को हमेशा अपने मनोचिकित्सक से गहन चर्चा करनी चाहिए।
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