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ऑस्ट्रेलिया के सबसे मेधावी छात्र न्यूनतम वेतन से कम पर गुजारा करने को मजबूर: शोधकर्ताओं की आर्थिक बदहाली पर उठे सवाल

ICN24 Newsroom 10 अग॰ 2026, 07:37 am
ऑस्ट्रेलिया के सबसे मेधावी छात्र न्यूनतम वेतन से कम पर गुजारा करने को मजबूर: शोधकर्ताओं की आर्थिक बदहाली पर उठे सवाल

ऑस्ट्रेलिया के उच्च शिक्षित शोधकर्ता और पीएचडी छात्र वर्तमान में गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं, जहां उनकी कमाई देश की न्यूनतम मजदूरी दर से भी कम है।

ऑस्ट्रेलिया अपनी विश्वस्तरीय शिक्षा और अनुसंधान प्रणाली पर गर्व करता है, लेकिन इस सफलता के पीछे काम करने वाले सबसे मेधावी दिमाग आज आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहे हैं। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, देश के कई उच्च शिक्षित शोधकर्ता और पीएचडी (PhD) छात्र ऐसी परिस्थितियों में काम कर रहे हैं जहाँ उनकी प्रभावी आय ऑस्ट्रेलिया के वैधानिक न्यूनतम वेतन (minimum wage) से भी कम है। यह स्थिति न केवल स्थानीय छात्रों के लिए, बल्कि ऑस्ट्रेलिया में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे विशाल भारतीय समुदाय के लिए भी चिंता का विषय बन गई है। आमतौर पर, ऑस्ट्रेलिया में शोध छात्रों को कॉमनवेल्थ रिसर्च ट्रेनिंग प्रोग्राम (RTP) के तहत स्टाइपेंड या वृत्तिका प्रदान की जाती है। हालांकि, मौजूदा मुद्रास्फीति और बढ़ते जीवन स्तर के खर्चों के बीच यह राशि अपर्याप्त साबित हो रही है। गणना के अनुसार, एक औसत पीएचडी छात्र को मिलने वाला स्टाइपेंड यदि घंटों के हिसाब से देखा जाए, तो वह ऑस्ट्रेलिया के वर्तमान न्यूनतम वेतन 23.23 डॉलर प्रति घंटे से काफी नीचे बैठता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि वे प्रति सप्ताह 40 से 50 घंटे शोध कार्य में बिताते हैं, लेकिन उन्हें मिलने वाली राशि बुनियादी जरूरतों जैसे किराया, भोजन और परिवहन के लिए भी पूरी नहीं पड़ रही है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए यह मुद्दा विशेष रूप से संवेदनशील है। ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्र अंतर्राष्ट्रीय छात्रों का एक बड़ा हिस्सा हैं, और उनमें से कई उच्च शोध के लिए यहाँ आते हैं। भारतीय परिवारों में उच्च शिक्षा को भविष्य की सुरक्षा के रूप में देखा जाता है, लेकिन यहाँ शोध के दौरान होने वाली आर्थिक कठिनाइयां छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाल रही हैं। कई भारतीय छात्र शोध के साथ-साथ गुजारे के लिए अन्य छोटे-मोटे काम करने को मजबूर हैं, जिससे उनके शोध की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। शिक्षा विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि ऑस्ट्रेलिया अपने 'स्मार्ट' देश होने के दर्जे को बरकरार रखना चाहता है, तो उसे अपने शोधकर्ताओं के निवेश पर पुनर्विचार करना होगा। कम आय के कारण कई प्रतिभाशाली छात्र अब अकादमिक शोध के बजाय निजी क्षेत्रों में शुरुआती नौकरियों को तरजीह दे रहे हैं, जहाँ वेतन अधिक है। इससे ऑस्ट्रेलिया में नवाचार (innovation) और वैज्ञानिक प्रगति की गति धीमी होने का खतरा पैदा हो गया है। विभिन्न छात्र संगठनों और यूनियनों ने संघीय सरकार से मांग की है कि शोध स्टाइपेंड को तत्काल प्रभाव से बढ़ाया जाए और इसे जीवन यापन की लागत से जोड़ा जाए। उनका कहना है कि यह केवल छात्रों की मदद की बात नहीं है, बल्कि यह देश के भविष्य के बौद्धिक ढांचे को बचाने की लड़ाई है। जब तक सरकार इस ओर ठोस कदम नहीं उठाती, तब तक ऑस्ट्रेलिया के सबसे मेधावी दिमाग आर्थिक असुरक्षा के साये में जीने को मजबूर रहेंगे।
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