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ऑस्ट्रेलिया: टैक्स सुधारों के बाद अब सार्वजनिक आवास में बड़ी बढ़ोतरी के लिए यूनियनों का दबाव
ICN24 Newsroom 19 अग॰ 2026, 05:37 am

निगेटिव गेयरिंग और कैपिटल गेन्स टैक्स पर अभियान के बाद, ऑस्ट्रेलिया के ट्रेड यूनियन अब सार्वजनिक आवास के विस्तार को आवास संकट के समाधान के रूप में देख रहे हैं।
ऑस्ट्रेलिया में आवास संकट एक गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है, और अब देश के प्रभावशाली ट्रेड यूनियन आंदोलन ने इस समस्या से निपटने के लिए एक नई रणनीति तैयार की है। निगेटिव गेयरिंग (Negative Gearing) और कैपिटल गेन्स टैक्स (Capital Gains Tax) में सुधारों के लिए दबाव बनाने के बाद, यूनियनों ने अब अपना ध्यान सार्वजनिक आवास (Public Housing) के बड़े पैमाने पर विस्तार की ओर केंद्रित कर दिया है। यूनियनों का तर्क है कि बाजार के भरोसे बैठने के बजाय सरकार को खुद घर बनाने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
यह कदम ऐसे समय में आया है जब ऑस्ट्रेलियाई समाज का एक बड़ा हिस्सा, जिसमें भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय भी शामिल है, रिकॉर्ड स्तर पर बढ़े किराए और घर खरीदने की बढ़ती कीमतों से जूझ रहा है। विशेष रूप से नए आए प्रवासियों और अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए, जो अक्सर किराए के मकानों पर निर्भर होते हैं, आवास की उपलब्धता और वहनीयता एक बड़ी चुनौती बन गई है। मेलबर्न और सिडनी जैसे शहरों में, जहां भारतीय आबादी घनी है, वहां किराए में बेतहाशा बढ़ोतरी ने मध्यम वर्गीय परिवारों के बजट को बिगाड़ दिया है।
यूनियन नेताओं का मानना है कि टैक्स रियायतें खत्म करना केवल आधा समाधान है। उनके अनुसार, वास्तविक राहत तब मिलेगी जब सरकार सीधे तौर पर किफ़ायती घरों के स्टॉक में वृद्धि करेगी। ट्रेड यूनियनों का कहना है कि दशकों से सार्वजनिक आवास में निवेश की कमी ने निजी डेवलपर्स को बाजार पर एकाधिकार दे दिया है, जिससे कीमतें आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गई हैं। वे अब एक ऐसी नीति की मांग कर रहे हैं जिसमें हर साल हजारों नए सरकारी घरों का निर्माण शामिल हो, जो विशेष रूप से कम आय वाले श्रमिकों और आवश्यक सेवा प्रदाताओं के लिए आरक्षित हों।
भारतीय समुदाय के संदर्भ में, यह मांग विशेष महत्व रखती है। भारत से आने वाले कई पेशेवर और श्रमिक ऑस्ट्रेलिया में अपने शुरुआती वर्षों में किराए के बाजार पर निर्भर होते हैं। सार्वजनिक आवास के विस्तार से न केवल कम आय वाले समूहों को मदद मिलेगी, बल्कि यह पूरे किराये के बाजार पर दबाव कम करेगा, जिससे भारतीय प्रवासियों के लिए भी रहने की लागत में कमी आने की संभावना है। सामुदायिक संगठनों ने अक्सर यह चिंता जताई है कि आवास की ऊंची लागत के कारण नए प्रवासियों को अपनी बचत का एक बड़ा हिस्सा केवल रहने पर खर्च करना पड़ता है, जिससे उनकी आर्थिक प्रगति धीमी हो जाती है।
हालांकि, इस योजना की अपनी चुनौतियां भी हैं। आलोचकों और कुछ आर्थिक विशेषज्ञों का तर्क है कि बड़े पैमाने पर सार्वजनिक आवास निर्माण के लिए भारी सरकारी खर्च की आवश्यकता होगी, जिससे बजट घाटा बढ़ सकता है। इसके अलावा, निर्माण क्षेत्र में श्रमिकों की कमी और सामग्री की बढ़ती कीमतें भी इस लक्ष्य को हासिल करने में बाधा बन सकती हैं। फिर भी, यूनियन आंदोलन इस बात पर अड़ा है कि बिना सरकारी हस्तक्षेप के आवास संकट को हल नहीं किया जा सकता। आने वाले महीनों में, यह मुद्दा संघीय राजनीति में एक बड़ा केंद्र बिंदु बनने की उम्मीद है, क्योंकि अगले चुनाव करीब आ रहे हैं और मतदाता आवास को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकता मान रहे हैं।
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