ऑस्ट्रेलिया
ऑस्ट्रेलियाई हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: रेगिस्तान से भारी मात्रा में भूजल निकालने की योजना पर लगाई रोक
ICN24 Newsroom 5 अग॰ 2026, 04:37 pm
ऑस्ट्रेलिया की हाई कोर्ट ने नॉर्दर्न टेरिटरी में बड़े पैमाने पर भूजल निकालने के लाइसेंस को रद्द कर दिया है, जिससे स्थानीय स्वदेशी समुदायों और पर्यावरणविदों को बड़ी जीत मिली है।
ऑस्ट्रेलिया की सर्वोच्च अदालत, हाई कोर्ट, ने नॉर्दर्न टेरिटरी (NT) में भूजल के दोहन से जुड़े एक बेहद विवादास्पद मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने उस लाइसेंस को रद्द कर दिया है जिसके तहत 'सिंगलटन स्टेशन' नामक स्थान से सालाना 40,000 मेगालीटर पानी निकालने की अनुमति दी गई थी। यह मात्रा सिडनी हार्बर में मौजूद पानी के कुल आयतन से दोगुनी है। यह फैसला नॉर्दर्न टेरिटरी सरकार और 'फॉर्च्यून एग्रीबिजनेस' कंपनी के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
इस कानूनी लड़ाई का नेतृत्व स्वदेशी 'म्वेरेम्प-अहाके' (Mpwerremp-Ahake) समुदाय के लोगों और नॉर्दर्न टेरिटरी के पर्यावरण केंद्र (ECNT) ने किया था। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि जल लाइसेंस जारी करते समय सरकार ने सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्रभावों का उचित आकलन नहीं किया था। स्वदेशी समुदायों का तर्क था कि इस परियोजना से उनके पवित्र स्थलों और उन वृक्षों को अपूरणीय क्षति पहुँचती जो सदियों से इस क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा रहे हैं।
यह मामला न केवल पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए भी विशेष मायने रखता है। भारतीय समुदाय के कई लोग ऑस्ट्रेलिया के कृषि और जल प्रबंधन क्षेत्रों से जुड़े हुए हैं। ऑस्ट्रेलिया, जो दुनिया के सबसे शुष्क महाद्वीपों में से एक है, वहाँ जल संसाधनों का प्रबंधन हमेशा से एक गंभीर मुद्दा रहा है। भारत के कई हिस्सों में भी भूजल की कमी एक बड़ी चुनौती है, ऐसे में ऑस्ट्रेलिया के इस न्यायिक फैसले को संसाधनों के संतुलित उपयोग की दिशा में एक नजीर के तौर पर देखा जा रहा है।
विस्तृत जानकारी के अनुसार, फॉर्च्यून एग्रीबिजनेस ने इस पानी का उपयोग सूखे इलाकों में बड़े पैमाने पर फल और सब्जियां उगाने के लिए करने की योजना बनाई थी। कंपनी का दावा था कि इससे क्षेत्र में रोजगार के अवसर पैदा होंगे और आर्थिक विकास होगा। हालांकि, अदालत ने माना कि आर्थिक लाभ के लिए प्राकृतिक संसाधनों और स्वदेशी अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
पर्यावरणविदों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे 'प्रकृति की जीत' बताया है। उनका कहना है कि अगर यह परियोजना शुरू हो जाती, तो इससे रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र के गहरे भूजल पर निर्भर पेड़-पौधे और जीव-जंतु नष्ट हो जाते। भारतीय समुदाय के पर्यावरण कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में होने वाली ऐसी परियोजनाओं के लिए कड़े मानदंड स्थापित करेगा, जहां विकास और संरक्षण के बीच टकराव की स्थिति पैदा होती है।
अंततः, यह फैसला यह सुनिश्चित करता है कि नॉर्दर्न टेरिटरी की सरकार को अब भविष्य में जल लाइसेंस देने की प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और स्वदेशी परामर्श को शामिल करना होगा। आईएनसी24 (ICN24) इस मामले पर अपनी नजर बनाए रखेगा कि इसका प्रभाव भविष्य के निवेशों और जल कानूनों पर क्या पड़ता है।
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