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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मासूम के कातिल सौतेले पिता की उम्रकैद बरकरार, कहा— 'मां के आंसुओं पर संदेह नहीं किया जा सकता'

ICN24 Newsroom 4 जुल॰ 2026, 09:31 pm
इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मासूम के कातिल सौतेले पिता की उम्रकैद बरकरार, कहा— 'मां के आंसुओं पर संदेह नहीं किया जा सकता'

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सौतेले बेटे की हत्या के आरोपी की उम्रकैद बरकरार रखते हुए कहा कि भले ही गवाह मुकर जाएं, लेकिन एक मां के आंसुओं और उसकी गवाही को झुठलाया नहीं जा सकता।

प्रयागराज स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अत्यंत भावुक और कानूनी रूप से महत्वपूर्ण मामले में निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए एक व्यक्ति की उम्रकैद की सजा की पुष्टि की है। यह मामला एक तीन वर्षीय मासूम बच्चे की उसके सौतेले पिता द्वारा की गई निर्मम हत्या से जुड़ा है। अदालत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि न्याय की प्रक्रिया में चश्मदीदों के बयान मायने रखते हैं, लेकिन जब गवाही एक पीड़ित मां की हो, तो उसकी प्रामाणिकता को चुनौती देना कठिन है। न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अक्सर आपराधिक मामलों में गवाह अपने बयानों से मुकर जाते हैं या दबाव में आ जाते हैं। हालांकि, इस विशिष्ट मामले में, मासूम की मां ने अपने ही पति के खिलाफ अडिग होकर गवाही दी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि दुनिया भर के गवाह भले ही अपने रुख से पीछे हट जाएं, लेकिन एक मां के आंसुओं और उसकी सत्यता पर संदेह करने का कोई कारण नहीं बनता। यह मामला उत्तर प्रदेश के एक जिले का है, जहां सौतेले पिता ने पारिवारिक विवाद या रंजिश के चलते मासूम बच्चे की जान ले ली थी। सत्र न्यायालय (ट्रायल कोर्ट) ने साक्ष्यों और मां के बयान के आधार पर आरोपी को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद दोषी ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की थी, जिसमें दलील दी गई थी कि मामले में पर्याप्त स्वतंत्र गवाह नहीं हैं और सजा को निरस्त किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने अपील को खारिज करते हुए कहा कि मां की गवाही अपने आप में पूर्ण है क्योंकि उसने अपने कलेजे के टुकड़े को खोया है। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि भारतीय न्याय प्रणाली में 'परिस्थितिजन्य साक्ष्य' और 'विश्वसनीय गवाह' की भूमिका अहम है। विशेष रूप से घरेलू हिंसा और बच्चों के खिलाफ अपराधों में, परिवार के सदस्यों की गवाही को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी यह खबर कानून के शासन और न्याय के प्रति भरोसे को मजबूत करने वाली है। विदेशों में बसे प्रवासी अक्सर भारत की कानूनी व्यवस्था में होने वाली देरी पर चर्चा करते हैं, लेकिन इस तरह के फैसले यह दर्शाते हैं कि जघन्य अपराधों के मामलों में भारतीय न्यायपालिका मानवीय संवेदनाओं और न्याय की मूल भावना को सर्वोपरि रखती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न केवल अपराधी के लिए दंड है, बल्कि समाज में उन लोगों के लिए भी एक कड़ा संदेश है जो मासूमों के खिलाफ अपराध करने का दुस्साहस करते हैं।
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