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श्रीनगर के स्कूलों में ड्रग्स को लेकर चौंकाने वाला खुलासा: 70 प्रतिशत छात्र मदद के रास्तों से अनजान
ICN24 Newsroom 20 जून 2026, 01:07 pm

श्रीनगर के डाइट (DIET) अध्ययन के अनुसार, लगभग 70% छात्र नशा मुक्ति केंद्रों से अनजान हैं, जो युवाओं में बढ़ते मादक पदार्थों के संकट पर गंभीर सवाल उठाता है।
श्रीनगर — जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में डिस्ट्रिक्ट इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग (DIET) द्वारा किए गए एक व्यापक अध्ययन ने किशोरों के बीच नशीली दवाओं के बढ़ते संकट और सरकारी जागरूकता अभियानों की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अध्ययन के अनुसार, श्रीनगर के स्कूलों में पढ़ने वाले लगभग 70 प्रतिशत छात्र इस बात से पूरी तरह अनजान हैं कि यदि वे या उनके दोस्त नशे की लत का शिकार हो जाएं, तो उन्हें मदद या परामर्श कहां से मिल सकता है।
यह सर्वेक्षण श्रीनगर के 20 माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों के कक्षा 9 से 12 तक के 3,100 छात्रों के बीच किया गया था। अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि करीब 69 प्रतिशत लड़के और 74 प्रतिशत लड़कियां किसी भी ऐसी संस्था या एजेंसी के बारे में नहीं जानते जो नशा मुक्ति, पुनर्वास या काउंसलिंग सेवाएं प्रदान करती हो। यह निष्कर्ष उन दावों को चुनौती देते हैं जो युवाओं को नशे के खतरों के प्रति शिक्षित करने के लिए चलाए जा रहे निरंतर अभियानों की सफलता की बात करते हैं।
अध्ययन में पाया गया कि छात्रों के बीच 'पीयर प्रेशर' यानी दोस्तों का दबाव नशे की शुरुआत का सबसे प्रमुख कारण है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल 'नशा बुरा है' कहना काफी नहीं है; शुरुआती हस्तक्षेप, समय पर काउंसलिंग और उपचार सेवाओं तक आसान पहुंच लत को रोकने के लिए अनिवार्य है। जागरूकता के स्तर में भी लैंगिक असमानता देखी गई है, जहां छात्राओं में नशे के परिणामों को लेकर समझ काफी कम पाई गई। विज्ञान विषय पढ़ने वाले छात्र, वाणिज्य और मानविकी के छात्रों की तुलना में नशे के वैज्ञानिक और स्वास्थ्य प्रभावों के बारे में अधिक जागरूक दिखे।
रिपोर्ट के अनुसार, तंबाकू उत्पादों का सेवन सबसे आम है, लेकिन अफीम और भांग जैसे नशीले पदार्थों का किशोरों के बीच बढ़ता प्रसार सबसे अधिक चिंताजनक है। अध्ययन ने सिफारिश की है कि स्कूल के पाठ्यक्रम में जीवन-कौशल (Life Skills) शिक्षा को शामिल किया जाए और स्कूल-आधारित काउंसलिंग सेवाओं को मजबूत किया जाए।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी यह रिपोर्ट अत्यंत प्रासंगिक है। मेलबर्न और सिडनी जैसे शहरों में भारतीय मूल के किशोर भी अक्सर पहचान के संकट और पीयर प्रेशर के कारण इसी तरह की चुनौतियों का सामना करते हैं। ऑस्ट्रेलिया में 'अल्कोहल एंड ड्रग फाउंडेशन' (ADF) जैसी संस्थाएं उपलब्ध हैं, लेकिन श्रीनगर का यह अध्ययन याद दिलाता है कि जब तक मदद के रास्तों की सही जानकारी छात्रों तक नहीं पहुंचेगी, तब तक केवल कानून और अभियान पर्याप्त नहीं होंगे। रिपोर्ट में जोर दिया गया है कि माता-पिता, शिक्षकों और स्थानीय समुदायों को एक समन्वित दृष्टिकोण अपनाना होगा ताकि युवाओं को इस खतरे से बचाया जा सके।
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