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अमेरिकी वीजा नीतियों में बदलाव किसी खास देश के खिलाफ नहीं: अमेरिकी विदेश विभाग का स्पष्टीकरण
ICN24 Newsroom 6 जून 2026, 04:30 am

अमेरिकी विदेश विभाग ने स्पष्ट किया है कि उसकी नई वीजा नीतियां भारत के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि ये वैश्विक स्तर पर समान रूप से लागू की जा रही हैं।
वॉशिंगटन — अमेरिका ने हाल ही में अपनी वीजा नीतियों और आव्रजन नियमों को लेकर उठ रहे सवालों पर स्थिति स्पष्ट की है। अमेरिकी विदेश विभाग ने एक आधिकारिक बयान में कहा है कि देश की आव्रजन नीतियों में किए जा रहे बदलाव या सख्ती किसी विशेष देश, विशेषकर भारत को निशाना बनाकर नहीं की गई है। विभाग के अनुसार, इन उपायों का उद्देश्य वैश्विक स्तर पर अमेरिकी आव्रजन कानूनों में एकरूपता और निरंतरता लाना है।
यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया है जब भारतीय आईटी (IT) पेशेवरों और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र से जुड़े लोगों के बीच भविष्य को लेकर चिंताएं बढ़ रही थीं। विशेष रूप से H-1B और L-1 वीजा श्रेणियों में बढ़ती छानबीन ने भारतीय समुदाय में भय का माहौल पैदा कर दिया था। विदेश विभाग के प्रवक्ता ने जोर देकर कहा कि अमेरिका कुशल भारतीय पेशेवरों के योगदान की सराहना करता है, लेकिन वीजा प्रक्रियाओं का प्रवर्तन सभी देशों के लिए समान है।
इस घटनाक्रम का प्रभाव केवल अमेरिका तक ही सीमित नहीं है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण संकेत है। कई भारतीय परिवार और पेशेवर अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया दोनों देशों के बीच आवाजाही करते हैं। ऑस्ट्रेलिया में काम कर रहे भारतीय आईटी विशेषज्ञ अक्सर अमेरिकी परियोजनाओं के लिए ऑन-साइट अवसर तलाशते हैं। ऐसे में अमेरिकी नीतियों में स्पष्टता से उन पेशेवरों को राहत मिलेगी जो सिडनी या मेलबर्न से अमेरिका जाने की योजना बना रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के इस रुख से उन अफवाहों पर लगाम लगेगी जो भारतीय कार्यबल के प्रति भेदभाव का दावा कर रही थीं। विभाग ने यह भी स्पष्ट किया कि वीजा के लिए प्रतीक्षा समय (Waiting Period) को कम करने और प्रक्रियाओं को डिजिटल बनाने के प्रयास जारी हैं, ताकि वैध यात्रियों और पेशेवरों को असुविधा न हो।
निष्कर्षतः, वॉशिंगटन के इस बयान ने यह संदेश दिया है कि नियम कड़े जरूर हो सकते हैं, लेकिन वे भेदभावपूर्ण नहीं हैं। भारतीय आव्रजन विशेषज्ञों का सुझाव है कि आवेदकों को अब अपने दस्तावेजीकरण में और अधिक सटीकता बरतने की आवश्यकता होगी, क्योंकि अब वैश्विक स्तर पर 'कंसिस्टेंसी' यानी एकरूपता ही भविष्य की नीति का आधार है।
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