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H-1B वीजा फीस पर ट्रंप प्रशासन को बड़ा झटका, अमेरिकी अदालत ने रद्द किया विवादास्पद आदेश
ICN24 Newsroom 10 जून 2026, 03:30 am

मैसाचुसेट्स की एक संघीय अदालत ने H-1B वीजा पर लगाए गए 1 लाख डॉलर के शुल्क को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है। ट्रंप ने इस फैसले पर कड़ी नाराजगी जताई है।
संयुक्त राज्य अमेरिका में एक संघीय न्यायाधीश ने ट्रंप प्रशासन के उस विवादास्पद फैसले को पलट दिया है, जिसके तहत कुशल विदेशी श्रमिकों के लिए H-1B वीजा शुल्क में भारी बढ़ोतरी का प्रस्ताव दिया गया था। मैसाचुसेट्स की अदालत ने सोमवार को इस 100,000 डॉलर के शुल्क को रद्द कर दिया। इस फैसले को कैलिफोर्निया सहित 19 अन्य राज्यों द्वारा दी गई कानूनी चुनौती के बाद सुनाया गया है। अदालत का यह निर्णय भारतीय तकनीकी पेशेवरों और उन कंपनियों के लिए एक बड़ी राहत माना जा रहा है जो वैश्विक प्रतिभाओं पर निर्भर हैं।
पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस अदालती आदेश पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। ट्रंप ने दावा किया कि वीजा शुल्कों को रोकना 'देश को बहुत बुरी तरह नुकसान पहुँचा रहा है'। उनका तर्क है कि इस तरह के शुल्क अमेरिकी खजाने में राजस्व बढ़ाने और स्थानीय नौकरियों की रक्षा के लिए आवश्यक थे। हालांकि, आलोचकों और उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी अधिक फीस केवल विदेशी प्रतिभाओं को अमेरिका आने से रोकने के लिए एक बाधा के रूप में तैयार की गई थी।
H-1B वीजा कार्यक्रम भारतीय आईटी पेशेवरों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। हर साल हजारों भारतीय इंजीनियर और विशेषज्ञ इस वीजा के माध्यम से अमेरिका में रोजगार पाते हैं। शुल्क में इतनी बड़ी वृद्धि न केवल व्यक्तिगत आवेदकों बल्कि उन अमेरिकी कंपनियों पर भी भारी वित्तीय बोझ डालती जो नवाचार के लिए अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को नियुक्त करती हैं। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि प्रशासन ने इस तरह की भारी फीस लागू करने की प्रक्रिया में कानूनी सीमाओं का उल्लंघन किया है।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए भी यह खबर महत्वपूर्ण है। हालांकि यह मामला अमेरिका का है, लेकिन वैश्विक आव्रजन नीतियों का प्रभाव अक्सर अन्य पश्चिमी देशों जैसे ऑस्ट्रेलिया और कनाडा पर भी पड़ता है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में बसे कई भारतीय प्रवासियों के परिवार के सदस्य अमेरिका में कार्यरत हैं। आव्रजन विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका में इस तरह की उदार नीतियां वैश्विक स्तर पर 'प्रतिभाओं के मुक्त प्रवाह' (free flow of talent) को बढ़ावा देती हैं, जिसका लाभ अंततः उन सभी देशों को मिलता है जहाँ भारतीय डायस्पोरा सक्रिय है।
इस कानूनी जीत को उन मानवाधिकार समूहों और व्यापारिक संघों के लिए एक मील का पत्थर माना जा रहा है, जो लंबे समय से तर्क दे रहे थे कि कुशल प्रवासन को हतोत्साहित करने से अमेरिकी अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धात्मकता कम होगी। फिलहाल, ट्रंप खेमे ने इस पर कानूनी लड़ाई जारी रखने के संकेत दिए हैं, लेकिन वर्तमान अदालती आदेश ने हजारों भावी आवेदकों को फिलहाल अनिश्चितता से बचा लिया है।
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