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ट्रंप के बड़े 'मिडटर्म कन्वेंशन' को लगा झटका, रिपब्लिकन उम्मीदवारों ने बनाई दूरी
ICN24 Newsroom 15 जुल॰ 2026, 08:31 am

डलास में होने वाले ट्रंप के पहले मिडटर्म कन्वेंशन में शामिल होने से कई रिपब्लिकन उम्मीदवार कतरा रहे हैं, जिससे पार्टी के भीतर फूट की आशंका जताई जा रही है।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक शक्ति का प्रदर्शन माना जा रहा 'मिडटर्म कन्वेंशन' अब एक अप्रत्याशित संकट का सामना कर रहा है। सितंबर में डलास में आयोजित होने वाले इस मेगा-इवेंट को 'ट्रंपपालूजा' (Trumpapalooza) का नाम दिया गया था, जिसका उद्देश्य नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से ठीक पहले रिपब्लिकन पार्टी के समर्थकों में जोश भरना था। हालांकि, ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार, पार्टी के भीतर एक बड़ी दरार उभरती नजर आ रही है। कई प्रमुख रिपब्लिकन उम्मीदवार इस कार्यक्रम में ट्रंप के साथ मंच साझा करने से बच रहे हैं, जिससे ट्रंप के मौजूदा प्रभाव पर सवाल उठने लगे हैं।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह हिचकिचाहट उम्मीदवारों की सोची-समझी चुनावी रणनीति का हिस्सा है। कई कड़े चुनावी मुकाबलों में उतरने वाले उम्मीदवार यह मान रहे हैं कि ट्रंप के साथ अत्यधिक निकटता उन्हें उन मध्यममार्गी (moderate) मतदाताओं से दूर कर सकती है, जो चुनाव परिणामों को तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विशेष रूप से उन राज्यों में जहां मुकाबला कांटे का है, उम्मीदवार ट्रंप की छाया से बाहर निकलकर अपनी स्वतंत्र छवि बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
डलास में होने वाला यह कन्वेंशन ट्रंप के लिए अपनी पकड़ साबित करने का एक बड़ा अवसर था। लेकिन अब यह आयोजन एक राजनीतिक परीक्षा बन गया है। पार्टी के भीतर यह बहस तेज हो गई है कि क्या ट्रंप का समर्थन अब भी एक जीत की गारंटी है या यह चुनावी बोझ बनता जा रहा है। आंतरिक सूत्रों का कहना है कि उम्मीदवारों को डर है कि ट्रंप की विवादास्पद टिप्पणियां और आक्रामक रैलियां उनके स्थानीय मुद्दों को पीछे छोड़ सकती हैं, जिससे प्रतिद्वंद्वी डेमोक्रेटिक पार्टी को फायदा मिल सकता है।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए अमेरिका की यह राजनीतिक उठापटक विशेष महत्व रखती है। अमेरिका में होने वाले नीतिगत बदलावों का सीधा असर वैश्विक बाजारों और रणनीतिक गठबंधनों पर पड़ता है। भारत, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका 'क्वाड' (QUAD) जैसे समूहों के माध्यम से गहराई से जुड़े हुए हैं। यदि रिपब्लिकन पार्टी के भीतर यह अस्थिरता बनी रहती है, तो इसका असर भविष्य की अमेरिकी विदेश नीति और भारत-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा प्राथमिकताओं पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल, ट्रंप की टीम इस स्थिति को संभालने और अधिक से अधिक उम्मीदवारों को आमंत्रित करने के प्रयास में जुटी है। लेकिन जिस तरह से प्रमुख नेताओं ने चुप्पी साधी हुई है, उसने आगामी चुनावों के लिए रिपब्लिकन पार्टी की एकजुटता पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। आने वाले हफ्तों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या 'ट्रंपपालूजा' अपनी चमक खो देगा या ट्रंप एक बार फिर पार्टी को अपने पीछे एकजुट करने में सफल होंगे।
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