शिक्षा
ब्लैक समर की विभीषिका और चुनावी उपेक्षा: क्या आग प्रभावितों का दर्द अब राजनीतिक मुद्दा नहीं रहा?
ICN24 Newsroom 20 जून 2026, 10:12 pm
2019-20 की भीषण आग के उत्तरजीवी आज भी मानसिक आघात और पुनर्वास की समस्याओं से जूझ रहे हैं, लेकिन संघीय चुनाव में उनकी आवाज़ कहीं खो गई है।
ऑस्ट्रेलिया के इतिहास में 'ब्लैक समर' के नाम से दर्ज 2019-20 की भीषण बुशफायर की यादें आज भी उन हज़ारों लोगों के ज़हन में ताज़ा हैं जिन्होंने अपना सब कुछ खो दिया था। लेकिन जैसे-जैसे देश अगले संघीय चुनाव की ओर बढ़ रहा है, इन उत्तरजीवियों (survivors) को महसूस हो रहा है कि उनकी पीड़ा और पुनर्वास की ज़रूरतें राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र से गायब हो चुकी हैं। चुनाव प्रचार के दौरान आर्थिक नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा पर तो ज़ोर दिया जा रहा है, लेकिन जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपदाओं और उनके दीर्घकालिक प्रभावों पर सन्नाटा पसरा हुआ है।
न्यू साउथ वेल्स और विक्टोरिया के क्षेत्रीय इलाकों में रहने वाले परिवारों के लिए, यह केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि उनके अस्तित्व की लड़ाई है। कई उत्तरजीवी आज भी अस्थाई घरों या कारवां में रहने को मजबूर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आपदा के बाद का मानसिक आघात (trauma) वर्षों तक बना रहता है, लेकिन इसके लिए आवश्यक संसाधन और विशेषज्ञ सहायता की भारी कमी है। चुनावी बहस में इन बुनियादी ज़रूरतों को प्राथमिकता न मिलना उन समुदायों के लिए चिंता का विषय है जो अभी भी खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण मोड़ है। पिछले दशक में, बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासियों ने क्षेत्रीय क्षेत्रों (regional areas) में घर बसाए हैं। इनमें से कई परिवार खेती या स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े हैं और उन्होंने ब्लैक समर की तबाही को करीब से देखा है। भाषा की बाधा और ऑस्ट्रेलिया के विशिष्ट बुशफायर चक्र की कम जानकारी के कारण, प्रवासी समुदाय के लिए आपदा प्रबंधन की 'शिक्षा' और तैयारी एक बड़ी चुनौती रही है। चुनावी वादों में इन प्रवासी समुदायों के लिए आपदा पूर्व तैयारी और शिक्षा से जुड़ी योजनाओं का अभाव स्पष्ट दिख रहा है।
शिक्षा के क्षेत्र में भी इस त्रासदी का गहरा प्रभाव पड़ा है। आग प्रभावित क्षेत्रों के स्कूलों में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए विशेष कोष की आवश्यकता थी। जानकारों का कहना है कि सरकार को केवल बुनियादी ढांचे के निर्माण तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि आपदा के बाद समाज को मानसिक रूप से मज़बूत बनाने के लिए शैक्षिक पाठ्यक्रम और सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रमों पर निवेश करना चाहिए।
चुनाव के शोर में जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन का मुद्दा दबने से यह सवाल खड़ा होता है कि क्या भविष्य में आने वाली ऐसी ही किसी आपदा के लिए हम तैयार हैं? उत्तरजीवियों का मानना है कि जब तक राजनीतिक नेतृत्व इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लेता, तब तक ब्लैक समर का घाव कभी नहीं भरेगा। भारतीय समुदाय सहित सभी प्रभावित नागरिक अब ऐसी नीतियों की मांग कर रहे हैं जो केवल कागज़ों तक सीमित न हों, बल्कि धरातल पर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करें।
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