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भारत में परिसीमन की राजनीति: क्या जानबूझकर रोकी जा रही है लोकतांत्रिक समानता?

ICN24 Newsroom 16 जून 2026, 01:31 am
भारत में परिसीमन की राजनीति: क्या जानबूझकर रोकी जा रही है लोकतांत्रिक समानता?

पांच दशकों से भारत में परिसीमन की प्रक्रिया राजनीतिक स्वार्थों की भेंट चढ़ रही है, जिससे शहरी क्षेत्रों और विकासशील आर्थिक केंद्रों का प्रतिनिधित्व कमजोर हुआ है।

भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में 'समान प्रतिनिधित्व' का वादा पिछले पांच दशकों से राजनीतिक दलों की खींचतान में फंसा हुआ है। चुनावी क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण या परिसीमन (Delimitation) की प्रक्रिया को 1976 और फिर 2001 में निलंबित किए जाने से भारतीय राजनीति में एक ऐसा असंतुलन पैदा हो गया है, जिसे विशेषज्ञ 'परिसीमन आर्बिट्रेज' कह रहे हैं। यह मुद्दा न केवल भारत के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय प्रवासियों के लिए भी प्रासंगिक है, जो एक पारदर्शी और डेटा-आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था के आदी हो चुके हैं। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि अत्यधिक भाषाई पहचान राष्ट्रीय एकता को खंडित कर सकती है। आज भारत उसी भाषाई जाल में फंसा नजर आता है। राज्यों का गठन प्रशासनिक सुगमता के बजाय भाषाई आधार पर किया गया, जिससे बड़े राज्यों के भीतर आर्थिक असमानताएं दब गईं। वर्तमान व्यवस्था में क्षेत्रीय राजनेता अक्सर अपनी सत्ता बचाने के लिए कृत्रिम 'पहचान' और 'दुश्मन' पैदा करते हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों को मल्लभूमि, कामतापुर और गौड़ा जैसे छोटे, प्रशासनिक रूप से कुशल राज्यों में विभाजित करने से क्षेत्रीय तनाव कम हो सकता है और शासन में सुधार आ सकता है। आंकड़े बताते हैं कि भारत की लगभग 37 प्रतिशत जनसंख्या अब शहरों में रहती है, लेकिन लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व केवल 16.4 प्रतिशत सीटों तक सीमित है। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु की 54 प्रतिशत आबादी शहरी है, फिर भी उनके पास केवल 17 प्रतिशत विधानसभा सीटें हैं। महाराष्ट्र और कर्नाटक (विशेषकर बेंगलुरु) में भी यही हाल है। यह विसंगति शहरी मध्यम वर्ग और करदाताओं की आवाज को कमजोर करती है, जबकि पुरानी कृषि-आधारित व्यवस्था के लाभार्थियों का वर्चस्व बना रहता है। भारतीय अर्थव्यवस्था 1970 के दशक के कृषि ढांचे से आगे बढ़कर सेवा और तकनीक आधारित हो चुकी है, लेकिन चुनावी नक्शे अभी भी पुराने ढर्रे पर हैं। इसका परिणाम यह है कि संसद उन लोगों के नियंत्रण में है जो पुरानी आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा हैं। इसके कारण वास्तविक आर्थिक सुधारों और शहरी बुनियादी ढांचे के बजाय, जनता के पैसे को लोकलुभावन योजनाओं और 'रेवड़ियों' पर खर्च किया जा रहा है। पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में मतदाता सूची में गड़बड़ी और राजनीतिक हिंसा के उदाहरण बताते हैं कि कैसे चुनावी तंत्र के साथ छेड़छाड़ कर खराब शासन को ही व्यवस्था का हिस्सा बना दिया गया है। प्रवासी भारतीयों के लिए यह समझना जरूरी है कि भारत का आर्थिक उदय तभी टिकाऊ होगा जब उसकी लोकतांत्रिक संस्थाएं वर्तमान आर्थिक सच्चाई को प्रतिबिंबित करेंगी। जब तक परिसीमन के माध्यम से प्रत्येक वोट का मूल्य समान नहीं होता, तब तक भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में सुधार एक कठिन चुनौती बनी रहेगी।
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