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डार्विन बंदरगाह के लिए 'मित्र' विदेशी खरीदार की वकालत: एंगस टेलर ने सुरक्षा चिंताओं पर दिया जोर

ICN24 Newsroom 8 जुल॰ 2026, 12:31 pm
डार्विन बंदरगाह के लिए 'मित्र' विदेशी खरीदार की वकालत: एंगस टेलर ने सुरक्षा चिंताओं पर दिया जोर

शैडो ट्रेजरर एंगस टेलर ने डार्विन बंदरगाह के लिए चीन के बजाय किसी 'मित्र' विदेशी खरीदार का सुझाव दिया है, जो भारत जैसे रणनीतिक साझेदारों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

ऑस्ट्रेलिया के शैडो ट्रेजरर एंगस टेलर ने डार्विन बंदरगाह (Darwin Port) के भविष्य को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस छेड़ दी है। टेलर ने सुझाव दिया है कि इस रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के लिए एक 'मित्र' विदेशी खरीदार की तलाश की जानी चाहिए। यह बयान ऐसे समय में आया है जब ऑस्ट्रेलिया अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रमुख संपत्तियों पर विदेशी नियंत्रण को लेकर अत्यंत सतर्क है। डार्विन बंदरगाह वर्तमान में 99 साल की लीज पर चीनी कंपनी 'लैंडब्रिज' (Landbridge) के पास है, जो लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। एंगस टेलर का यह प्रस्ताव ऑस्ट्रेलिया की सामरिक स्वायत्तता को मजबूत करने की दिशा में एक बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऑस्ट्रेलिया को ऐसे निवेशों का स्वागत करना चाहिए जो साझा मूल्यों और सुरक्षा हितों वाले देशों से आते हों। हालांकि उन्होंने किसी विशिष्ट देश का नाम नहीं लिया, लेकिन 'मित्र' देशों की श्रेणी में भारत, अमेरिका और जापान जैसे देशों को देखा जा रहा है, जो क्वाड (Quad) गठबंधन के माध्यम से ऑस्ट्रेलिया के साथ रक्षा और आर्थिक संबंधों को प्रगाढ़ कर रहे हैं। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए यह घटनाक्रम विशेष महत्व रखता है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौता (ECTA) पहले से ही लागू है, और दोनों देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। यदि डार्विन बंदरगाह जैसे महत्वपूर्ण परिसंपत्ति में भारत या किसी अन्य लोकतांत्रिक सहयोगी की भूमिका बढ़ती है, तो यह न केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करेगा बल्कि क्षेत्र में शक्ति संतुलन को भी बनाए रखेगा। डार्विन ऑस्ट्रेलिया का उत्तरी प्रवेश द्वार है और रक्षा की दृष्टि से यह अत्यंत संवेदनशील स्थान पर स्थित है। पूर्ववर्ती गठबंधन सरकार द्वारा 2015 में बंदरगाह को चीनी कंपनी को लीज पर देने के फैसले की काफी आलोचना हुई थी। हालांकि, वर्तमान अल्बानीज़ सरकार ने एक सुरक्षा समीक्षा के बाद कहा है कि फिलहाल लीज को रद्द करने का कोई आधार नहीं मिला है। इसके बावजूद, एंगस टेलर का कहना है कि भविष्य में किसी भी बदलाव की स्थिति में हमें भरोसेमंद साझेदारों की ओर देखना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि बुनियादी ढांचे में विदेशी पूंजी आवश्यक है, लेकिन यह पूंजी कहां से आ रही है, यह ऑस्ट्रेलिया की संप्रभुता के लिए सर्वोपरि होना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि डार्विन बंदरगाह पर किसी 'मित्र' खरीदार की उपस्थिति से न केवल सुरक्षा जोखिम कम होंगे, बल्कि यह व्यापार के नए रास्ते भी खोलेगा। भारतीय लॉजिस्टिक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र की बड़ी कंपनियां दुनिया भर में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया के रणनीतिक विमर्श में इस तरह के विकल्पों पर चर्चा होना भारतीय मूल के उन पेशेवरों और निवेशकों के लिए भी उत्साहजनक है जो ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच सेतु का काम कर रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार विपक्ष के इस सुझाव पर क्या प्रतिक्रिया देती है और क्या डार्विन बंदरगाह के स्वामित्व ढांचे में कोई बदलाव देखने को मिलता है।
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