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सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो मामले में दोषी की सजा रद्द की: पीड़िता से शादी और मुआवजे के आधार पर मानवीय फैसला
ICN24 Newsroom 12 जून 2026, 12:01 am
सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय आधार पर एक पॉक्सो मामले में दोषी की 10 साल की सजा रद्द कर दी है, क्योंकि पीड़िता ने बालिग होने के बाद आरोपी से शादी कर ली थी।
भारत के उच्चतम न्यायालय ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत दर्ज एक मामले में अभूतपूर्व फैसला सुनाते हुए दोषी की सजा को रद्द कर दिया है। न्यायालय का यह निर्णय इस तथ्य पर आधारित है कि पीड़िता ने बालिग होने के बाद स्वेच्छा से आरोपी के साथ विवाह कर लिया था और अब दोनों एक सुखी वैवाहिक जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इसके साथ ही, आरोपी ने पीड़िता को भविष्य की सुरक्षा के तौर पर 10 लाख रुपये का मुआवजा भी प्रदान किया है।
न्यायमूर्ति ए.एस. ओका और न्यायमूर्ति पंकज मिथल की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना है, न कि किसी बसते हुए परिवार को उजाड़ना। अदालत ने पाया कि यह मामला विशेष परिस्थितियों के अंतर्गत आता है। पीड़िता, जिसे उसके पहले पति ने छोड़ दिया था, ने आरोपी के साथ नया जीवन शुरू किया और अब वे समाज में पति-पत्नी के रूप में शांतिपूर्वक रह रहे हैं।
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, 2019 में एक निचली अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद मद्रास उच्च न्यायालय ने भी इस सजा को बरकरार रखा था। हालांकि, पीड़िता ने स्वयं सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अपील की कि उसकी शादी और वर्तमान पारिवारिक स्थिति को देखते हुए उसके पति की सजा माफ की जाए। पीड़िता का तर्क था कि यदि उसका पति जेल जाता है, तो उसका और उसके परिवार का भविष्य संकट में पड़ जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि चूंकि पीड़िता अब बालिग है और उसने अपनी मर्जी से समझौता किया है, इसलिए सजा को जारी रखना न्यायोचित नहीं होगा। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि 10 लाख रुपये की राशि पीड़िता के नाम पर सावधि जमा (FD) के रूप में रखी गई है, जो उसकी वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला पॉक्सो जैसे सख्त कानूनों में 'मानवीय दृष्टिकोण' की आवश्यकता को दर्शाता है, विशेषकर उन मामलों में जहां किशोर प्रेम संबंधों या बाद में हुए विवाह के कारण कानूनी पेचीदगियां पैदा हो जाती हैं। हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इसे हर मामले के लिए उदाहरण नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर ही निर्णय लिए जाने चाहिए। अब यह जोड़ा कानूनी बाधाओं से मुक्त होकर एक साथ रह सकेगा।
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