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सनातन परंपरा: धार्मिक अनुष्ठानों में पत्नी के बाईं ओर बैठने का क्या है महत्व?

ICN24 Newsroom 11 जून 2026, 04:00 pm
सनातन परंपरा: धार्मिक अनुष्ठानों में पत्नी के बाईं ओर बैठने का क्या है महत्व?

सनातन धर्म के अनुसार धार्मिक अनुष्ठानों में पत्नी का स्थान पति के बाईं ओर होता है, जिसे 'वामांगी' का प्रतीक माना जाता है। जानिए इसके पीछे के आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण।

सनातन धर्म में विवाह और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ी परंपराएं न केवल आध्यात्मिक महत्व रखती हैं, बल्कि उनके पीछे गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक तर्क भी छिपे होते हैं। हिंदू संस्कृति में पत्नी को 'अर्धांगिनी' कहा गया है, जिसका अर्थ है पति के शरीर का आधा हिस्सा। किसी भी शुभ कार्य या धार्मिक पूजा के दौरान आपने अक्सर देखा होगा कि पत्नी हमेशा पति के बाईं ओर बैठती है। इस परंपरा की जड़ें प्राचीन शास्त्रों और पौराणिक मान्यताओं में गहराई से जुड़ी हुई हैं। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव के 'अर्धनारीश्वर' स्वरूप को इस परंपरा का मुख्य आधार माना जाता है। इस स्वरूप में भगवान शिव का बायां हिस्सा देवी पार्वती का है। इसी अवधारणा के कारण पत्नी को 'वामांगी' कहा जाता है, जिसका अर्थ है 'बाएं अंग का हिस्सा'। ज्योतिष शास्त्र और सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार, पुरुष का दाहिना हिस्सा और महिला का बायां हिस्सा शुभ और ऊर्जावान माना जाता है। यही कारण है कि पूजा-पाठ, दान और यज्ञ जैसे शुभ कार्यों में पत्नी का बाईं ओर बैठना अनिवार्य माना गया है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए अपनी इन मूल परंपराओं को समझना और अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करना अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। सिडनी, मेलबर्न और ब्रिस्बेन जैसे शहरों में बने भव्य हिंदू मंदिरों में जब भी सामूहिक सत्यनारायण कथा या गृह प्रवेश की पूजा होती है, तो प्रवासी भारतीय इन नियमों का पूरी निष्ठा से पालन करते हैं। सामुदायिक केंद्रों में आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी यह देखा जाता है कि हिंदू विवाह पद्धति के दौरान 'सात फेरों' के बाद जब कन्या पत्नी का रूप लेती है, तो वह अपना स्थान बदलकर पति के बाईं ओर आ जाती है। धार्मिक दृष्टिकोण के अलावा, इसके पीछे एक व्यावहारिक पक्ष भी है। हस्तरेखा विज्ञान और शरीर विज्ञान के अनुसार, मनुष्य का बायां हिस्सा हृदय के अधिक समीप होता है। पत्नी को बाईं ओर बिठाना इस बात का प्रतीक है कि वह परिवार की प्रेम, करुणा और संवेदनाओं की रक्षक है। जहाँ पति को बाहरी दुनिया की चुनौतियों से निपटने और परिवार की सुरक्षा का प्रतीक (दाहिना पक्ष) माना जाता है, वहीं पत्नी को आंतरिक शांति और लक्ष्मी का रूप माना जाता है। हालांकि, कुछ विशेष परिस्थितियों में यह स्थान बदल भी सकता है। शास्त्रों के अनुसार, कन्यादान, विवाह, आशीर्वाद ग्रहण करने और ब्राह्मणों के पैर धोने जैसे कार्यों में पत्नी का दाईं ओर बैठना भी उचित माना गया है। लेकिन सामान्य पूजा और यज्ञ में 'वामांगी' परंपरा का ही पालन किया जाता है। आधुनिक युग में भी, भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई परिवार अपनी जड़ों से जुड़े रहने के लिए इन बारीकियों को सहेज रहे हैं, जो उनकी सांस्कृतिक पहचान को विदेशों में भी जीवंत बनाए रखती है।
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