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भाजपा और आरएसएस के बीच बढ़ती दूरियां? मोहन भागवत के बयान ने छेड़ी नई बहस

ICN24 Newsroom 6 जून 2026, 03:00 am
भाजपा और आरएसएस के बीच बढ़ती दूरियां? मोहन भागवत के बयान ने छेड़ी नई बहस

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयानों ने भाजपा और संघ के रिश्तों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या 'विश्वगुरु' के दावों और जमीनी हकीकत में अंतर है?

भारतीय राजनीति के गलियारों में इन दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच बढ़ती कथित दूरियों को लेकर चर्चाएं तेज हैं। संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा हाल ही में दिए गए बयानों ने इन कयासों को और हवा दे दी है। वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव परिणामों के बाद संघ की भाषा में आया बदलाव महज संयोग नहीं, बल्कि एक गहरा रणनीतिक संकेत है। वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान जैसे जानकारों का तर्क है कि भाजपा की चुनावी रणनीति और 'अजेय' होने के अहंकार पर संघ ने परोक्ष रूप से प्रहार किया है। भागवत का यह कहना कि 'एक सच्चा सेवक कभी अहंकार नहीं पालता', सीधे तौर पर सत्ता पक्ष के शीर्ष नेतृत्व की ओर इशारा माना जा रहा है। पिछले एक दशक में यह पहली बार देखा जा रहा है जब संघ ने सार्वजनिक मंचों से आत्मचिंतन और मर्यादित व्यवहार की वकालत की है। 'विश्वगुरु' बनने के दावों पर भी अब सवाल उठने लगे हैं। जहां एक ओर सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बढ़ती साख का हवाला देती है, वहीं संघ के करीबी हलकों में जमीनी मुद्दों, जैसे बेरोजगारी और बढ़ती असमानता पर ध्यान न देने को लेकर असंतोष देखा जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रवासी भारतीय (NRIs) अक्सर भारत की राजनीतिक स्थिरता को निवेश और सामाजिक जुड़ाव के नजरिए से देखते हैं। सिडनी और मेलबर्न में सक्रिय भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई विश्लेषकों का मानना है कि यदि संघ और भाजपा के बीच यह वैचारिक मतभेद बढ़ता है, तो इसका असर भविष्य की नीति-निर्माण प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है। संघ पारंपरिक रूप से भाजपा का वैचारिक मार्गदर्शक रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में सरकार के कामकाज की शैली में संघ की भूमिका सीमित नजर आई है। अंततः, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भाजपा नेतृत्व संघ की इन नसीहतों को गंभीरता से लेता है या फिर सत्ता का नया समीकरण अपनी अलग राह चुनेगा। फिलहाल, भागवत के तेवरों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संगठन के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है और आने वाले समय में संगठन बनाम सरकार का यह द्वंद्व और गहरा सकता है।
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