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ग्वालियर कलेक्ट्रेट में बिजली संकट: 21 दिनों से अंधेरे में चार सरकारी विभाग, भीषण गर्मी में कर्मचारी बेहाल
ICN24 Newsroom 10 जून 2026, 09:31 pm

ग्वालियर कलेक्ट्रेट में ट्रांसफार्मर जलने के 21 दिन बाद भी बिजली बहाल नहीं हुई है, जिससे कर्मचारी भीषण गर्मी में काम करने को मजबूर हैं।
मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में प्रशासनिक सुस्ती का एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित चार महत्वपूर्ण सरकारी विभागों में पिछले 21 दिनों से बिजली गुल है। भीषण गर्मी और उमस के बीच कर्मचारी टॉर्च की रोशनी में काम करने और पसीने से तर-बतर होकर अपनी ड्यूटी निभाने को मजबूर हैं। यह स्थिति तब है जब ग्वालियर इन दिनों लू और रिकॉर्ड तोड़ तापमान का सामना कर रहा है।
जानकारी के अनुसार, करीब तीन सप्ताह पहले कलेक्ट्रेट परिसर में लगे एक विद्युत ट्रांसफार्मर में भीषण आग लग गई थी। इस दुर्घटना के बाद से ही कलेक्ट्रेट के एक हिस्से की बिजली आपूर्ति पूरी तरह ठप हो गई। प्रभावित विभागों में मुख्य रूप से जनसंपर्क विभाग, मत्स्य विभाग और सांख्यिकी विभाग सहित एक अन्य कार्यालय शामिल है। हैरानी की बात यह है कि इतने दिन बीत जाने के बाद भी जिला प्रशासन और बिजली विभाग ने वैकल्पिक व्यवस्था करने या ट्रांसफार्मर बदलने में कोई सक्रियता नहीं दिखाई है।
कार्यालयों में पंखे और कूलर बंद होने के कारण काम करने की स्थितियां असहनीय हो गई हैं। कंप्यूटर और प्रिंटर जैसे जरूरी उपकरण शोपीस बनकर रह गए हैं, जिससे सरकारी कामकाज बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। कई कर्मचारी दफ्तर के बाहर पेड़ों की छांव में बैठने को मजबूर हैं, तो कुछ अंधेरे कमरों में मोबाइल की लाइट जलाकर जरूरी फाइलों का निपटारा कर रहे हैं।
इस मामले में जब कर्मचारियों से बात की गई, तो उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि गर्मी के कारण दफ्तर में बैठना 'टार्चर' जैसा है। वरिष्ठ अधिकारियों को कई बार सूचित किया गया है, लेकिन बजट और तकनीकी कारणों का हवाला देकर मामले को टाला जा रहा है। आम जनता जो अपने कार्यों के लिए इन दफ्तरों में आती है, उन्हें भी बिना काम कराए लौटना पड़ रहा है।
ग्वालियर की यह घटना भारत में बुनियादी ढांचे के रखरखाव और प्रशासनिक प्रतिक्रिया की सुस्ती को दर्शाती है। जहां एक ओर सरकार डिजिटल इंडिया और स्मार्ट सिटी की बात कर रही है, वहीं कलेक्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण केंद्र में तीन हफ्ते तक बिजली न होना व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। प्रवासी भारतीय समुदाय के लिए भी यह खबर चिंताजनक है, क्योंकि कई एनआरआई अपने पैतृक दस्तावेजों और भूमि संबंधी कार्यों के लिए इन्हीं सरकारी कार्यालयों पर निर्भर रहते हैं। फिलहाल, कर्मचारी और स्थानीय नागरिक केवल इस उम्मीद में हैं कि प्रशासन जल्द ही कुंभकर्णी नींद से जागेगा।
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