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MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: आपसी सहमति से संबंध के बाद शादी से मुकरना दुष्कर्म नहीं
ICN24 Newsroom 19 जुल॰ 2026, 04:34 am

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि दो बालिगों के बीच आपसी सहमति से संबंध बने हों, तो बाद में शादी से इनकार करना बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता।
जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों के बाद यदि विवाह नहीं हो पाता, तो उसे बलात्कार नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने कहा कि केवल शादी के वादे से मुकर जाना किसी व्यक्ति को दुष्कर्म या आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है। यह फैसला जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया की एकल पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया।
मामले के तथ्यों के अनुसार, याचिकाकर्ता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 (बलात्कार) और 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत मामला दर्ज किया गया था। आरोप था कि उसने पीड़िता के साथ शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाए और बाद में शादी करने से इनकार कर दिया, जिससे आहत होकर पीड़िता ने आत्मघाती कदम उठा लिया। हालांकि, अदालत ने मामले की गहराई से जांच करने के बाद पाया कि दोनों लंबे समय से एक-दूसरे को जानते थे और उनके बीच के संबंध पूरी तरह स्वैच्छिक थे।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में 'शादी के झूठे वादे' और 'शादी के वादे को निभाने में विफलता' के बीच के अंतर को रेखांकित किया। अदालत ने कहा कि यदि कोई पुरुष शुरू से ही महिला को धोखा देने की नीयत रखता है और केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए शादी का झूठा वादा करता है, तो वह बलात्कार का दोषी हो सकता है। लेकिन, यदि संबंध लंबे समय तक रहे हों और बाद में किन्हीं वास्तविक कारणों या परिस्थितियों के चलते विवाह नहीं हो पाता, तो इसे आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि बालिग होने के नाते व्यक्ति को अपने निर्णयों के परिणामों का आभास होता है। कानून की धारा 90 के तहत 'तथ्य की गलतफहमी' (misconception of fact) तभी लागू होती है जब सहमति पूरी तरह से धोखे पर आधारित हो। इस मामले में, पीठ ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि आरोपी की मंशा शुरू से ही छल करने की थी।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी यह फैसला प्रासंगिक है, क्योंकि वहां भी सहमति और वैवाहिक विवादों को लेकर कड़े कानून हैं। अक्सर एनआरआई (NRI) समुदाय में वैवाहिक वादों और फिर उनके टूटने के बाद कानूनी पेचीदगियां सामने आती हैं। भारतीय अदालतों का यह रुख स्पष्ट करता है कि आधुनिक दौर में निजी संबंधों और कानूनी अपराधों के बीच एक स्पष्ट विभाजन रेखा आवश्यक है, ताकि कानून का दुरुपयोग न हो।
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