राजनीति
शादी के बाद भी बेटी है मायके परिवार का हिस्सा, सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला
ICN24 Newsroom 6 जून 2026, 02:00 pm

सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि विवाह के आधार पर किसी बेटी को उसके मायके के परिवार की परिभाषा से बाहर नहीं किया जा सकता है।
भारत के उच्चतम न्यायालय ने लिंग समानता की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए स्पष्ट किया है कि एक विवाहित बेटी अपने पिता के परिवार की सदस्य बनी रहती है। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पुराने आदेश को पलटते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि पैतृक संपत्ति, उत्तराधिकार और अन्य कानूनी लाभों के लिए 'परिवार' की परिभाषा से शादीशुदा बेटी को बाहर रखना न केवल भेदभावपूर्ण है, बल्कि यह संवैधानिक सिद्धांतों के भी खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि विवाह एक ऐसी संस्था नहीं है जो बेटी और उसके जन्म के परिवार के बीच के संबंधों को खत्म कर दे। न्यायालय ने इस बात पर नाराजगी व्यक्त की कि कई सरकारी योजनाओं और कानूनी प्रावधानों में अभी भी 'परिवार' की परिभाषा में केवल अविवाहित बेटियों को ही शामिल किया जाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि चाहे बेटी शादीशुदा हो या नहीं, उसका अपने माता-पिता के साथ कानूनी और भावनात्मक रिश्ता बरकरार रहता है, और उसे मिलने वाले लाभों से उसे केवल विवाह के आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता।
यह मामला उत्तर प्रदेश के एक प्रशासनिक विवाद से शुरू हुआ था, जहां एक विवाहित महिला को उसके पिता की मृत्यु के बाद मिलने वाले लाभों से इसलिए वंचित कर दिया गया था क्योंकि वह शादीशुदा थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पूर्व में इस फैसले को सही ठहराया था, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इसे सिरे से खारिज कर दिया है। यह फैसला विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है जो पैतृक व्यवसाय या कृषि भूमि में अपना हिस्सा चाहती हैं।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए भी यह खबर काफी मायने रखती है। प्रवासी भारतीयों (NRIs) के बीच अक्सर भारत में मौजूद पैतृक संपत्ति को लेकर कानूनी विवाद देखे जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे कई भारतीय परिवारों में यह गलतफहमी रहती है कि शादी के बाद या विदेश जाने के बाद बेटियों का भारत में संपत्ति पर अधिकार खत्म हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्टीकरण उन बेटियों को कानूनी मजबूती प्रदान करता है जो अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से भविष्य के कई संपत्ति विवादों में स्पष्टता आएगी। यह निर्णय न केवल संपत्ति के अधिकारों को सुरक्षित करता है, बल्कि भारतीय समाज में प्रचलित उस पितृसत्तात्मक सोच को भी चुनौती देता है जो बेटी को शादी के बाद 'पराया धन' मानती है। अब कानून की नजर में, बेटा और बेटी दोनों ही अपने जन्म के परिवार के स्थायी सदस्य माने जाएंगे, चाहे उनकी वैवाहिक स्थिति कुछ भी हो।
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