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‘गंगा पर चिकन खाना अपराध नहीं’, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने लोकतांत्रिक अधिकारों और जमानत में देरी पर उठाए सवाल

ICN24 Newsroom 27 जुल॰ 2026, 04:36 pm
‘गंगा पर चिकन खाना अपराध नहीं’, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने लोकतांत्रिक अधिकारों और जमानत में देरी पर उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने नागरिक स्वतंत्रता पर चिंता जताते हुए कहा कि गंगा पर चिकन खाना कोई अपराध नहीं है और शांतिपूर्ण विरोध पर जेल गलत है।

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने देश में सिमटते 'लोकतांत्रिक स्थान' (Democratic Space) और नागरिक स्वतंत्रताओं के हनन पर गहरी चिंता व्यक्त की है। भोपाल स्थित नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (NLIU) में आयोजित 14वें जस्टिस जे.एस. वर्मा स्मृति व्याख्यान को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत के किसी भी कानून में गंगा नदी पर नाव में बैठकर चिकन खाना अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। जस्टिस भुइयां ने अपने संबोधन के दौरान उन मामलों का विशेष रूप से उल्लेख किया जहां मामूली आधारों पर नागरिकों, विशेषकर युवाओं को लंबे समय तक जेल में रखा गया। उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक हालिया मामले का हवाला दिया, जिसमें कुछ छात्रों को केवल इसलिए महीनों तक जेल में रहना पड़ा क्योंकि उन्होंने गंगा नदी में एक नाव यात्रा के दौरान चिकन खाया था और गाजा के समर्थन में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किया था। न्यायाधीश ने इस बात पर हैरानी जताई कि ऐसे मामलों में भी निचली अदालतों द्वारा जमानत देने में अत्यधिक देरी की गई। जस्टिस भुइयां ने कहा कि असहमति व्यक्त करना लोकतंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि 'जमानत नियम है और जेल अपवाद', इस कानूनी सिद्धांत का पालन हर स्तर पर होना चाहिए। उन्होंने न्यायपालिका को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि अदालतों ने नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा में देरी की, तो इससे देश के लोकतांत्रिक ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है। उन्होंने कहा, "लोकतंत्र में विरोध की आवाज को दबाना या मामूली बातों को अपराध बनाना कानून के शासन के खिलाफ है।" ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी यह विषय काफी प्रासंगिक है, क्योंकि प्रवासी समुदाय अक्सर भारत में मानवाधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं के विकास पर करीब से नजर रखता है। जस्टिस भुइयां के ये बयान भारत की बदलती कानूनी और सामाजिक परिस्थितियों को दर्शाते हैं। उन्होंने नागरिक अधिकारों के संरक्षण में उच्च न्यायपालिका की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि कानून की व्याख्या करते समय व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। व्याख्यान के दौरान उन्होंने प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक निरोध) के बढ़ते उपयोग पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पुलिस और प्रशासन को यह समझना चाहिए कि किसी की स्वतंत्रता छीनना अंतिम विकल्प होना चाहिए, न कि विरोध को दबाने का पहला जरिया। जस्टिस भुइयां के इस कड़े रुख को कानूनी विशेषज्ञों द्वारा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रति एक बड़ी प्रतिबद्धता के रूप में देखा जा रहा है। उनके संबोधन ने एक बार फिर भारत में न्यायिक सक्रियता और मौलिक अधिकारों की सुरक्षा पर नई बहस छेड़ दी है।
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