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JNU प्रशासन ने उमर खालिद की किताब पर चर्चा के लिए ऑडिटोरियम की बुकिंग रद्द की; 'अधूरी जानकारी' का दिया हवाला
ICN24 Newsroom 10 अग॰ 2026, 01:37 pm

जेएनयू प्रशासन ने 10 अगस्त को होने वाली उमर खालिद की किताब 'फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज' पर चर्चा के लिए ऑडिटोरियम की बुकिंग यह कहते हुए रद्द कर दी कि आयोजकों ने अधूरी जानकारी दी थी।
नई दिल्ली के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रशासनिक नियमों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने 10 अगस्त को होने वाले एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम के लिए ऑडिटोरियम की बुकिंग को अंतिम समय पर रद्द कर दिया है। यह कार्यक्रम पूर्व छात्र और जेल में बंद कार्यकर्ता उमर खालिद की हालिया किताब 'फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज' पर चर्चा के लिए आयोजित किया जाना था।
प्रशासन द्वारा जारी सूचना के अनुसार, स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज (SSS-1) के ऑडिटोरियम की बुकिंग को निरस्त करने का मुख्य कारण आवेदन के दौरान दी गई 'अधूरी जानकारी' को बताया गया है। विश्वविद्यालय के अधिकारियों का कहना है कि आयोजकों ने कार्यक्रम की प्रकृति और इसमें शामिल होने वाले वक्ताओं के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं दी थी, जो सुरक्षा और परिसर के प्रोटोकॉल के उल्लंघन की श्रेणी में आता है। यह कार्यक्रम दोपहर 3 बजे से शाम 6 बजे के बीच निर्धारित किया गया था।
उमर खालिद की किताब 'फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज' भारतीय समाज में हाशिए पर रहने वाले समुदायों और उनके संघर्षों पर केंद्रित है। खालिद, जो वर्तमान में दिल्ली दंगों से जुड़े यूएपीए (UAPA) मामले में न्यायिक हिरासत में हैं, जेएनयू के पूर्व छात्र रहे हैं और उनकी पहचान एक मुखर कार्यकर्ता के रूप में रही है। इस किताब पर चर्चा के आयोजन को लेकर छात्रों और शिक्षकों के एक वर्ग में काफी उत्साह था, लेकिन प्रशासन के इस निर्णय ने विवाद खड़ा कर दिया है।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए जेएनयू का नाम हमेशा से बौद्धिक विमर्श और छात्र राजनीति का केंद्र रहा है। वहां की घटनाओं का असर वैश्विक स्तर पर भारतीय प्रवासियों के बीच भी महसूस किया जाता है, विशेषकर उन लोगों के लिए जो शैक्षणिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों में रुचि रखते हैं। जेएनयू प्रशासन का यह कदम ऐसे समय में आया है जब भारत के विभिन्न शिक्षण संस्थानों में वैचारिक चर्चाओं के लिए जगह कम होने की खबरें अक्सर सामने आती रहती हैं।
आयोजकों का पक्ष है कि उन्होंने सभी आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी की थीं और कार्यक्रम को रद्द करना वैचारिक असहमति को दबाने का एक तरीका है। दूसरी ओर, विश्वविद्यालय प्रबंधन ने स्पष्ट किया है कि परिसर में शांति बनाए रखने और नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए सभी आयोजनों की गहन समीक्षा की जाती है। फिलहाल, इस रद्दीकरण के बाद परिसर में छात्र संगठनों के बीच हलचल बढ़ गई है और भविष्य में इस चर्चा को किसी वैकल्पिक स्थान पर आयोजित करने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।
यह घटना एक बार फिर उस व्यापक बहस को जन्म देती है कि क्या विश्वविद्यालय जैसे संस्थान केवल डिग्री देने के केंद्र हैं या वे विभिन्न विचारधाराओं के संगम स्थल भी होने चाहिए। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले पूर्व जेएनयू छात्रों (Alumni) ने भी सोशल मीडिया पर इस निर्णय को लेकर अपनी प्रतिक्रियाएं साझा की हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारत के आंतरिक शैक्षणिक मामले विदेशों में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
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