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अपराध पीड़ितों के इलाज में लापरवाही बर्दाश्त नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने अस्पतालों को दी कड़ी चेतावनी

ICN24 Newsroom 8 अग॰ 2026, 02:37 pm
अपराध पीड़ितों के इलाज में लापरवाही बर्दाश्त नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने अस्पतालों को दी कड़ी चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि गंभीर अपराधों के पीड़ितों को तत्काल चिकित्सा सहायता देना अस्पतालों का अनिवार्य कर्तव्य है और इसमें किसी भी तरह की कोताही नहीं बरती जा सकती।

नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि अस्पताल गंभीर अपराधों के पीड़ितों के इलाज में किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं बरत सकते। न्यायालय ने कहा कि जब किसी गंभीर अपराध के शिकार व्यक्ति को तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता होती है, तो अस्पताल और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रक्रियात्मक देरी या प्रशासनिक कमियों के कारण मरीज की जान जोखिम में न आए। न्यायमूर्ति की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि जीवन का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि अस्पतालों और पुलिस के बीच समन्वय के लिए व्यापक दिशा-निर्देश (गाइडलाइन्स) तैयार किए जाएंगे ताकि भविष्य में ऐसी किसी भी चूक की पुनरावृत्ति न हो। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि अक्सर 'मेडिको-लीगल' मामलों की जटिलताओं के कारण अस्पतालों में पीड़ितों को समय पर इलाज मिलने में देरी होती है, जो घातक साबित हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख उन मामलों के संदर्भ में आया है जहाँ अस्पताल कानूनी औपचारिकताओं या पुलिस रिपोर्ट के इंतजार में घायल व्यक्ति का इलाज शुरू करने में हिचकिचाते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि डॉक्टर का प्राथमिक कर्तव्य जान बचाना है, न कि कागजी कार्रवाई पूरी करना। प्रस्तावित दिशा-निर्देशों में पुलिस और अस्पताल प्रबंधन के लिए स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) शामिल होगी, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि 'गोल्डन ऑवर' (दुर्घटना के बाद का पहला महत्वपूर्ण घंटा) के दौरान पीड़ित को सर्वोत्तम संभव उपचार मिले। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए यह निर्णय विशेष महत्व रखता है। प्रवासी भारतीयों (NRIs) के कई परिजन भारत में रहते हैं और अक्सर ऐसी आपातकालीन स्थितियों में वे अस्पताल प्रशासन और पुलिस की जटिलताओं को लेकर चिंतित रहते हैं। यह आदेश न केवल भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में जवाबदेही तय करेगा, बल्कि उन अंतरराष्ट्रीय यात्रियों और प्रवासियों को भी सुरक्षा का अहसास कराएगा जो भारत की यात्रा करते हैं। ऑस्ट्रेलियाई स्वास्थ्य प्रणाली में जिस तरह 'ड्यूटी ऑफ केयर' को प्राथमिकता दी जाती है, भारत का यह कदम उसी वैश्विक मानक की ओर एक महत्वपूर्ण बढ़त है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाए जाने वाले ये नए नियम निजी और सरकारी दोनों तरह के अस्पतालों पर बाध्यकारी होंगे। यदि कोई अस्पताल इन नियमों का उल्लंघन करता पाया जाता है, तो उसे भारी दंड और लाइसेंस रद्द होने जैसी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को भी इस संबंध में सुझाव देने का निर्देश दिया है ताकि स्वास्थ्य और कानून के बीच एक सुगम सेतु बनाया जा सके। अंततः, यह निर्णय भारत में आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं की पारदर्शिता और संवेदनशीलता को बढ़ाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी संकेत दिया है कि वह इस मामले की निगरानी जारी रखेगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अस्पताल केवल लाभ कमाने वाली संस्थाएं न बनकर मानवता की सेवा के अपने मूल धर्म का पालन करें।
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