राजनीति
गहलोत-पायलट विवाद फिर गरमाया: 2020 की बगावत का जिक्र कर पूर्व मुख्यमंत्री ने साधा निशाना
ICN24 Newsroom 9 जून 2026, 02:00 pm

राजस्थान कांग्रेस में एक बार फिर आंतरिक कलह सामने आई है। अशोक गहलोत ने सचिन पायलट पर निशाना साधते हुए 2020 के सियासी संकट की याद दिलाई है।
राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच बरसों पुरानी अदावत एक बार फिर सार्वजनिक मंच पर आ गई है। आगामी चुनावों और सांगठनिक फेरबदल की आहट के बीच गहलोत ने साल 2020 की उस बगावत का जिक्र किया है जिसने राज्य में कांग्रेस सरकार को अस्थिर कर दिया था। गहलोत ने स्पष्ट तौर पर कहा कि पायलट अपनी पुरानी गलतियों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं और जब तक 'भूलने और माफ करने' की भावना नहीं आएगी, तब तक दूरियां कम होना मुश्किल है।
यह विवाद ऐसे समय में दोबारा उभरा है जब कांग्रेस पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट होने का प्रयास कर रही है। गहलोत का यह बयान न केवल उनके और पायलट के बीच के गहरे मतभेदों को दर्शाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि राजस्थान कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन को लेकर खींचतान अभी खत्म नहीं हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2028 के विधानसभा चुनावों से पहले अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए गहलोत एक बार फिर पुराने जख्मों को कुरेद रहे हैं ताकि आलाकमान के सामने पायलट की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा रहे।
उल्लेखनीय है कि 2020 में सचिन पायलट ने अपने समर्थक विधायकों के साथ हरियाणा के मानेसर में डेरा डाल दिया था, जिससे गहलोत सरकार पर संकट के बादल मंडराने लगे थे। हालांकि बाद में गांधी परिवार के हस्तक्षेप के बाद पायलट वापस लौट आए थे, लेकिन दोनों नेताओं के बीच कड़वाहट कभी कम नहीं हुई। गहलोत ने ताजा टिप्पणी में संकेत दिया कि पायलट को अपनी उस 'गलती' के लिए सार्वजनिक रूप से खेद प्रकट करना चाहिए था, जो उन्होंने अब तक नहीं किया है।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय, विशेषकर राजस्थान मूल के प्रवासी, इस घटनाक्रम पर करीब से नजर रख रहे हैं। सिडनी और मेलबर्न में सक्रिय राजस्थानी संगठनों के सदस्यों का मानना है कि इस तरह की गुटबाजी का सीधा असर राज्य के विकास और निवेश पर पड़ता है। प्रवासी भारतीयों के लिए राजस्थान में राजनीतिक स्थिरता महत्वपूर्ण है क्योंकि कई बड़े निवेश प्रोजेक्ट्स इन्हीं प्रशासनिक समीकरणों पर टिके होते हैं।
कांग्रेस आलाकमान के लिए यह स्थिति एक नई चुनौती बन गई है। एक तरफ पायलट युवाओं के बीच लोकप्रिय हैं और संगठन में नई जान फूंकने का माद्दा रखते हैं, वहीं दूसरी तरफ गहलोत का अनुभव और उनकी चाणक्य नीति पार्टी के लिए अपरिहार्य है। फिलहाल, गहलोत के इस वार पर सचिन पायलट की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में इस 'कोल्ड वॉर' की वापसी चर्चा का केंद्र बनी हुई है।
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