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नेहरू के 'शिप टू माउथ' के दौर से मोदी के 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन तक: भारत की खाद्य सुरक्षा क्रांति
ICN24 Newsroom 7 जून 2026, 05:00 pm

भारत ने आजादी के बाद खाद्य संकट के दौर से निकलकर आज 80 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त राशन देने तक का लंबा सफर तय किया है।
स्वतंत्र भारत के इतिहास में खाद्य सुरक्षा की यात्रा देश के विकास की सबसे प्रभावशाली कहानियों में से एक है। 1947 में स्वतंत्रता के समय भारत को एक ऐसी जर्जर कृषि अर्थव्यवस्था विरासत में मिली थी, जहां उत्पादकता कम थी और सिंचाई के साधन नगण्य थे। आज सात दशकों के बाद, भारत न केवल दुनिया के सबसे बड़े खाद्यान्न उत्पादकों में शामिल है, बल्कि 80 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को हर महीने मुफ्त भोजन उपलब्ध कराने वाली एक अभूतपूर्व कल्याणकारी प्रणाली संचालित कर रहा है।
पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल के दौरान, भारत खाद्य संकट से जूझ रहा था। उस समय की स्थिति को 'शिप टू माउथ' अर्थव्यवस्था कहा जाता था, जिसका अर्थ था कि भारत की जनता का पेट विदेशों से आने वाले जहाजों पर निर्भर था। 1950-51 में भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन मात्र 50.82 मिलियन टन था। अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत को अमेरिका के 'पब्लिक लॉ-480' (PL-480) कार्यक्रम के तहत अनाज आयात करना पड़ता था। यह निर्भरता न केवल आर्थिक बल्कि राजनीतिक रूप से भी देश को असुरक्षित महसूस कराती थी।
1960 के दशक के मध्य में आए सूखे ने भारत को अपनी कृषि नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया। यहीं से हरित क्रांति (Green Revolution) का उदय हुआ। डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन के नेतृत्व और सरकारी प्रोत्साहन से उच्च उपज वाली बीजों, आधुनिक सिंचाई और उर्वरकों का उपयोग शुरू हुआ। 1965 में भारतीय खाद्य निगम (FCI) की स्थापना ने खरीद और बफर स्टॉक की व्यवस्था को मजबूत किया। धीरे-धीरे भारत आयात पर निर्भरता खत्म कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने आत्मनिर्भरता से आगे बढ़कर 'कल्याणकारी वितरण' के युग में प्रवेश किया है। इस बदलाव की सबसे बड़ी परीक्षा कोविड-19 महामारी के दौरान हुई। जब दुनिया भर में आर्थिक गतिविधियां थम गई थीं, तब भारत सरकार ने 'प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना' (PMGKAY) शुरू की। इस योजना के तहत राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के लाभार्थियों को अतिरिक्त मुफ्त अनाज देना शुरू किया गया। जनवरी 2023 से केंद्र सरकार ने इस योजना को पूरी तरह मुफ्त कर दिया और अब इसे 2028 तक के लिए बढ़ा दिया गया है।
आधुनिक तकनीक ने इस वितरण प्रणाली को और पारदर्शी बनाया है। 'वन नेशन वन राशन कार्ड' पहल ने विशेष रूप से प्रवासी श्रमिकों के लिए देश के किसी भी कोने से राशन लेना संभव बना दिया है। आधार-आधारित सत्यापन और डिजिटल डेटाबेस ने भ्रष्टाचार और लीकेज को कम किया है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी यह गर्व का विषय है कि उनका मूल देश आज दुनिया के सबसे बड़े खाद्य सहायता कार्यक्रमों का सफलतापूर्वक नेतृत्व कर रहा है। 1950 के 50 मिलियन टन उत्पादन के मुकाबले 2025-26 तक 376 मिलियन टन उत्पादन का लक्ष्य भारत की बढ़ती ताकत का प्रतीक है।
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