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ट्रम्प सरकार की $100,000 H-1B फीस को अमेरिकी अदालत ने क्यों किया रद्द? अस्पतालों और विश्वविद्यालयों की दलीलों ने पलटा पासा
ICN24 Newsroom 10 जून 2026, 03:01 am

अमेरिकी संघीय अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा प्रस्तावित भारी-भरकम H-1B वीजा फीस को खारिज कर दिया है, जिससे भारतीय पेशेवरों को बड़ी राहत मिली है।
अमेरिकी संघीय अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल के दौरान प्रस्तावित $100,000 (करीब 84 लाख रुपये) की भारी-भरकम H-1B वीजा फीस को आधिकारिक तौर पर रद्द कर दिया है। अदालत का यह निर्णय अमेरिका के विभिन्न राज्यों, अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों द्वारा दायर की गई याचिकाओं के बाद आया है। इन संस्थानों ने चेतावनी दी थी कि इतनी ऊंची फीस लागू होने से देश के स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में पेशेवरों की भारी किल्लत हो जाएगी।
H-1B वीजा भारतीय आईटी पेशेवरों और शोधकर्ताओं के बीच सबसे लोकप्रिय वर्क परमिट है। ट्रम्प प्रशासन का तर्क था कि उच्च शुल्क से स्थानीय अमेरिकी श्रमिकों के हितों की रक्षा होगी, लेकिन विशेषज्ञों ने इसके विपरीत परिणामों की आशंका जताई थी। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के अस्पतालों और सार्वजनिक विश्वविद्यालयों ने तर्क दिया कि वे विदेशी डॉक्टरों और शोधकर्ताओं को नियुक्त करने के लिए इतना अधिक शुल्क वहन नहीं कर सकते।
अदालत में पेश की गई दलीलों के अनुसार, अमेरिका के कई अस्पताल विदेशी मूल के डॉक्टरों पर निर्भर हैं, जिनमें से एक बड़ी संख्या भारतीयों की है। यदि यह फीस लागू होती, तो कई छोटे और चैरिटी अस्पतालों को अपने दरवाजे बंद करने पड़ते या सेवाओं में कटौती करनी पड़ती। इसी तरह, विश्वविद्यालयों ने तर्क दिया कि उच्च स्तरीय शोध और शिक्षण पदों के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतिभाओं की कमी से अमेरिकी नवाचार को धक्का लगेगा।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी यह खबर महत्वपूर्ण है। कई भारतीय पेशेवर जो वर्तमान में ऑस्ट्रेलिया में कार्यरत हैं, भविष्य में अमेरिका जाने की योजना बनाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के 'प्रतिबंधात्मक' शुल्क हटने से वैश्विक स्तर पर कुशल श्रम की आवाजाही सुगम बनी रहेगी। यह फैसला न केवल पेशेवरों के आर्थिक बोझ को कम करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि अमेरिका जैसे देश अंतरराष्ट्रीय प्रतिभाओं के लिए एक आकर्षक गंतव्य बने रहें।
न्यायाधीश ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि प्रशासन ने इस शुल्क वृद्धि के आर्थिक प्रभावों का सही मूल्यांकन नहीं किया था। यह फैसला उन हजारों भारतीय इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और शिक्षकों के लिए एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। फिलहाल, फीस संरचना पुरानी व्यवस्था के अनुसार ही रहेगी, जिससे वीजा आवेदन करने वाली कंपनियों और संस्थानों ने राहत की सांस ली है।
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