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अल नीनो का साया: मानसून पर संकट के बादल, क्या 1950 के बाद पहली बार बिगड़ेगा बारिश का गणित?
ICN24 Newsroom 15 जून 2026, 08:31 pm
भारत मौसम विज्ञान विभाग ने इस वर्ष मानसून में सामान्य से कम बारिश की चेतावनी दी है। अल नीनो के प्रभाव के चलते 1950 के बाद पहली बार विशेष मौसमी संकेत देखे जा रहे हैं।
भारत में इस वर्ष मानसून की बारिश को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के ताजा अनुमानों के अनुसार, आगामी मानसून सत्र के दौरान वर्षा का दीर्घकालिक औसत (LPA) लगभग 90 प्रतिशत रहने की संभावना है। वैज्ञानिकों का मानना है कि 'अल नीनो' के सक्रिय होने से बारिश की मात्रा में गिरावट आ सकती है। गौरतलब है कि 1950 के बाद यह पहली बार है जब मौसम के मिजाज में इस तरह के दुर्लभ और जटिल संकेत मिल रहे हैं।
मौसम विभाग के अनुसार, एलपीए (Long Period Average) किसी विशेष क्षेत्र में एक निश्चित अवधि, जैसे एक महीने या पूरे मौसम के दौरान दर्ज की गई वर्षा का औसत होता है। आमतौर पर इसकी गणना 30 से 50 वर्षों के आंकड़ों के आधार पर की जाती है। इस बार के पूर्वानुमान में चार प्रतिशत की मॉडल त्रुटि (Error Margin) भी शामिल है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि स्थिति नाजुक बनी हुई है। यदि बारिश 90 प्रतिशत से कम रहती है, तो इसे 'कम वर्षा' की श्रेणी में रखा जाएगा।
अल नीनो एक ऐसी खगोलीय और समुद्री घटना है जिसमें प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। इसका सीधा असर वैश्विक हवाओं और बारिश के चक्र पर पड़ता है। भारत के कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था के लिए यह एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है, क्योंकि देश की अधिकांश खेती आज भी मानसूनी बारिश पर निर्भर है। धान, दलहन और तिलहन जैसी फसलों के उत्पादन पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका है, जिससे खाद्य महंगाई बढ़ सकती है।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी यह खबर महत्वपूर्ण है। भारत में मानसून की अनिश्चितता का असर न केवल वहां के निर्यात और बाजार पर पड़ता है, बल्कि प्रवासी भारतीयों (NRIs) के निवेश और घरेलू अर्थव्यवस्था से उनके जुड़ाव को भी प्रभावित करता है। इसके अलावा, ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच कृषि व्यापार संबंधों पर भी इस मौसमी बदलाव का असर देखा जा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि हालांकि अल नीनो का खतरा मंडरा रहा है, लेकिन 'इंडियन ओशन डिपोल' (IOD) जैसी अन्य मौसमी स्थितियां अगर सकारात्मक रहती हैं, तो वे अल नीनो के प्रभाव को कुछ हद तक कम कर सकती हैं। फिलहाल, आईएमडी और अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसियां प्रशांत महासागर की गतिविधियों पर बारीकी से नजर रख रही हैं। आगामी कुछ हफ्तों में स्थिति और स्पष्ट होने की उम्मीद है, जिसके बाद सरकार और किसान अपनी रणनीतियों में बदलाव कर सकते हैं।
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