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कोलाथुर में 'बदलाव' की बयार: स्टालिन के पूर्व निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं ने डीएमके की 'लापरवाही' पर उठाए सवाल

ICN24 Newsroom 6 जून 2026, 03:30 pm
कोलाथुर में 'बदलाव' की बयार: स्टालिन के पूर्व निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं ने डीएमके की 'लापरवाही' पर उठाए सवाल

तमिलनाडु के कोलाथुर निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। तीन बार के विधायक और मुख्यमंत्री रहे एम.के. स्टालिन की हार के बाद, जनता अब 'बदलाव' और डीएमके की कथित लापरवाही पर चर्चा कर रही है।

तमिलनाडु की राजनीति में आए हालिया भूचाल के एक महीने बाद, कोलाथुर निर्वाचन क्षेत्र के गलियारों में एक ही शब्द गूंज रहा है— 'मातरम' यानी बदलाव। यह वह क्षेत्र है जिसे मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का अभेद्य किला माना जाता था, जहाँ से उन्होंने लगातार तीन बार जीत दर्ज की थी। हालांकि, हालिया चुनावी नतीजों ने न केवल सत्ता के समीकरण बदल दिए, बल्कि द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के भीतर आत्मनिरीक्षण का दौर भी शुरू कर दिया है। स्थानीय निवासियों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि डीएमके नेतृत्व अपनी जीत को लेकर अति-आत्मविश्वासी हो गया था। कोलाथुर के मध्यम वर्गीय और श्रमिक वर्ग के मतदाताओं के बीच यह धारणा घर कर गई है कि पार्टी जमीनी हकीकत से दूर हो गई थी। स्थानीय दुकानदारों और निवासियों का कहना है कि बुनियादी ढांचे के विकास और वादों के बावजूद, पार्टी कार्यकर्ताओं और आम जनता के बीच एक दूरी पैदा हो गई थी जिसे विपक्षी खेमे ने बखूबी भुनाया। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय, विशेष रूप से तमिल प्रवासियों के लिए, यह घटनाक्रम काफी महत्वपूर्ण है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में रहने वाले तमिल मूल के लोग तमिलनाडु की राजनीति पर गहरी नजर रखते हैं। प्रवासी समुदाय के बीच अक्सर यह चर्चा होती है कि कैसे वंशवाद और सत्ता की निरंतरता कभी-कभी प्रशासनिक शिथिलता का कारण बनती है। कोलाथुर का परिणाम यह दर्शाता है कि मतदाता अब केवल चेहरे या विरासत के आधार पर वोट देने को तैयार नहीं हैं। मतदाताओं के अनुसार, 'बदलाव' की यह मांग रातों-रात पैदा नहीं हुई। इसमें महंगाई, बेरोजगारी और स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार की शिकायतों ने ईंधन का काम किया। कोलाथुर के एक वरिष्ठ नागरिक ने बताया कि पार्टी ने यह मान लिया था कि मुख्यमंत्री का निर्वाचन क्षेत्र होने के कारण लोग आंख मूंदकर समर्थन करेंगे, लेकिन जनता ने 'लापरवाही' के खिलाफ अपना जनादेश दिया है। फिलहाल, डीएमके के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने और संगठन के भीतर जवाबदेही तय करने की है। यह चुनाव परिणाम न केवल तमिलनाडु बल्कि पूरे भारत के राजनीतिक परिदृश्य के लिए एक सबक है कि किसी भी निर्वाचन क्षेत्र को 'सुरक्षित' मान लेना लोकतंत्र में सबसे बड़ी गलती हो सकती है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि स्टालिन और उनकी पार्टी इस हार से क्या सीख लेती है और आगामी चुनावों के लिए अपनी रणनीति में क्या बदलाव करती है।
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