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दिल्ली की अदालत ने जमानत याचिकाओं पर एनसीबी के ढुलमुल रवैये पर जताई कड़ी निराशा
ICN24 Newsroom 1 अग॰ 2026, 10:35 pm

दिल्ली की एक अदालत ने मादक द्रव्य नियंत्रण ब्यूरो (एनसीबी) की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए साक्ष्यों के अभाव में जमानत याचिकाओं का विरोध करने के तरीके पर नाराजगी व्यक्त की है।
देश की राजधानी दिल्ली की एक विशेष अदालत ने मादक द्रव्य नियंत्रण ब्यूरो (एनसीबी) की कार्यप्रणाली पर गहरी निराशा व्यक्त की है। अदालत ने पाया कि एजेंसी कई मामलों में आरोपियों की जमानत याचिकाओं का विरोध तो करती है, लेकिन उनके पास अपनी दलीलों को पुख्ता करने के लिए पर्याप्त सबूत या कानूनी आधार नहीं होते। न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि जांच एजेंसी का यह रवैया न केवल न्याय प्रक्रिया में देरी करता है, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सिद्धांतों के भी विरुद्ध है।
विशेष न्यायाधीश ने एक हालिया सुनवाई के दौरान कहा कि एनसीबी अक्सर बिना किसी ठोस साक्ष्य या वैज्ञानिक रिपोर्ट के जमानत का विरोध करती है। अदालत ने रेखांकित किया कि केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर किसी व्यक्ति को अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता, खासकर जब एजेंसी यह साबित करने में विफल रहे कि आरोपी का अपराध से सीधा संबंध है। अदालत ने इसे एजेंसी की पेशेवर विफलता करार दिया और भविष्य में सुधार की चेतावनी दी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि एनसीबी जैसी महत्वपूर्ण केंद्रीय एजेंसी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अदालत के समक्ष ठोस और दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत करे। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी भारत की कानूनी व्यवस्था में आ रहे ये बदलाव महत्वपूर्ण हैं। कई प्रवासी भारतीय, जिनका भारत में व्यापारिक या पारिवारिक संबंध है, अक्सर भारत की न्याय प्रणाली और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की कार्यक्षमता पर नजर रखते हैं। भारत में मानवाधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं का उचित पालन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि को प्रभावित करता है।
अदालत ने यह भी नोट किया कि कई मामलों में एनसीबी की ओर से पेश किए गए गवाहों के बयानों में विरोधाभास पाया गया। न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि यदि एजेंसी किसी आरोपी को हिरासत में रखना चाहती है, तो उसे एनडीपीएस (NDPS) अधिनियम की धारा 37 की कठोर शर्तों को पूरा करने वाले तथ्य पेश करने होंगे। बिना किसी पुख्ता सबूत के केवल आशंकाओं के आधार पर जमानत का विरोध करना अदालती समय की बर्बादी है।
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर भारत में जांच एजेंसियों की जवाबदेही पर बहस छेड़ दी है। ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच बढ़ते द्विपक्षीय संबंधों के बीच, कानूनी पारदर्शिता और न्यायिक निष्पक्षता जैसे विषय दोनों देशों के प्रवासियों के लिए चर्चा का केंद्र रहते हैं। सिडनी और मेलबर्न में सक्रिय भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई कानूनी मंचों पर अक्सर इस बात की चर्चा होती है कि कैसे भारत की शीर्ष एजेंसियां अपने जांच मानकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनुरूप बना सकती हैं।
निष्कर्ष के तौर पर, दिल्ली की अदालत का यह कड़ा रुख उन सभी जांच एजेंसियों के लिए एक संदेश है जो बिना तैयारी के कानूनी लड़ाइयां लड़ती हैं। अदालत ने उम्मीद जताई है कि एनसीबी अपने जांच तंत्र में सुधार करेगी ताकि निर्दोषों को परेशानी न हो और दोषियों को कानून के दायरे में लाया जा सके।
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