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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: अवमानना की कार्रवाई 'व्यक्तिगत' है, कॉर्पोरेट निकायों के खिलाफ नहीं

ICN24 Newsroom 21 जून 2026, 12:26 am
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: अवमानना की कार्रवाई 'व्यक्तिगत' है, कॉर्पोरेट निकायों के खिलाफ नहीं

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही केवल संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ की जा सकती है, न कि किसी वैधानिक या कॉर्पोरेट निकाय के खिलाफ।

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही 'इन परसोनम' (व्यक्तिगत) प्रकृति की होती है। न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की एकल पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह व्यवस्था दी कि अवमानना की कार्यवाही किसी वैधानिक प्राधिकरण या कॉर्पोरेट निकाय के खिलाफ नहीं चलाई जा सकती, बल्कि यह केवल उन विशिष्ट व्यक्तियों या अधिकारियों के विरुद्ध विचारणीय है जिन्होंने अदालती आदेश की जानबूझकर अवज्ञा की है। अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि अवमानना कानून का मुख्य उद्देश्य न्याय के प्रशासन की गरिमा को बनाए रखना है। चूंकि 'जानबूझकर अवज्ञा' एक मानसिक स्थिति और आचरण का परिणाम है, इसलिए यह केवल एक जीवित व्यक्ति द्वारा ही संभव है। एक कॉर्पोरेट इकाई या वैधानिक संस्था का अपना कोई स्वतंत्र दिमाग या इरादा नहीं होता है, इसलिए उसे सीधे तौर पर अवमानना के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। यह निर्णय कानूनी विशेषज्ञों और आम जनता, विशेषकर उन लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जो सरकारी विभागों या निगमों के साथ कानूनी विवादों में उलझे हुए हैं। अक्सर याचिकाकर्ता किसी विभाग के नाम पर अवमानना याचिका दायर कर देते हैं, लेकिन इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि याचिकाकर्ता को उन विशिष्ट अधिकारियों की पहचान करनी होगी जो आदेश के अनुपालन के लिए जिम्मेदार थे और जिन्होंने इसका उल्लंघन किया है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी यह कानूनी स्पष्टता विशेष महत्व रखती है। प्रवासी भारतीय (एनआरआई) अक्सर भारत में अपनी संपत्तियों, उत्तराधिकार या सिविल मामलों को लेकर अदालती कार्यवाही में शामिल होते हैं। यदि कोई सरकारी निकाय या वैधानिक संस्था उनके पक्ष में आए अदालती आदेश का पालन नहीं करती है, तो उन्हें अब यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी अवमानना याचिका सीधे उस जिम्मेदार अधिकारी के विरुद्ध हो, न कि केवल विभाग के नाम पर। कानूनी जानकारों का मानना है कि इस स्पष्टीकरण से अदालतों में लंबित अवमानना के मामलों में कमी आएगी और जवाबदेही अधिक सटीक होगी। न्यायमूर्ति गुरु ने स्पष्ट किया कि जब तक किसी विशिष्ट व्यक्ति को पक्षकार नहीं बनाया जाता और उसकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय नहीं की जाती, तब तक अवमानना की कार्रवाई कानूनी रूप से टिक नहीं पाएगी। यह फैसला भारत के अवमानना कानून, 1971 की व्याख्या को और अधिक प्रभावी बनाता है। अंततः, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह रुख नौकरशाही में जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह सुनिश्चित करता है कि अधिकारी अपनी वैधानिक संस्था के पीछे छिपकर अदालती आदेशों की अनदेखी नहीं कर सकते, क्योंकि दंड की तलवार अंततः व्यक्तिगत रूप से उन पर ही गिरेगी।
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