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MP हाईकोर्ट का अहम फैसला: आपसी सहमति से संबंध के बाद शादी से इनकार करना रेप नहीं

ICN24 Newsroom 19 जुल॰ 2026, 04:33 am
MP हाईकोर्ट का अहम फैसला: आपसी सहमति से संबंध के बाद शादी से इनकार करना रेप नहीं

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि दो बालिगों के बीच सहमति से संबंध बने हों, तो बाद में शादी से इनकार करना दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि दो बालिग व्यक्तियों के बीच आपसी सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंधों को केवल इस आधार पर दुष्कर्म (रेप) नहीं माना जा सकता कि पुरुष ने बाद में महिला से विवाह करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि 'शादी का वादा तोड़ना' और 'शादी के झूठे वादे' के माध्यम से सहमति प्राप्त करने के बीच एक स्पष्ट कानूनी अंतर होता है। न्यायमूर्ति जी.एस. अहलूवालिया की एकल पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की, जिसमें एक व्यक्ति के खिलाफ दुष्कर्म और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप लगाए गए थे। अदालत ने आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर और कानूनी कार्रवाई को रद्द करते हुए कहा कि यदि किसी महिला ने अपनी मर्जी से शारीरिक संबंध बनाए हैं और वह परिणामों से अवगत थी, तो बाद में शादी न होने पर इसे जबरन यौन संबंध नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 के तहत दुष्कर्म के मामलों में 'तथ्यों की गलत धारणा' (Misconception of Fact) का तत्व होना आवश्यक है। यदि आरोपी का शुरू से ही शादी करने का इरादा नहीं था और उसने केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए धोखा दिया, तो ही उसे दोषी ठहराया जा सकता है। लेकिन यदि परिस्थितिजन्य कारणों या किसी विवाद के कारण शादी नहीं हो पाती है, तो इसे 'वादे का उल्लंघन' (Breach of Promise) माना जाएगा, न कि बलात्कार। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि आज के आधुनिक समाज में, जहाँ बालिग व्यक्ति अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं, कानून यह मानकर चलता है कि महिला को अपने कृत्यों के परिणामों की समझ है। यदि कोई लंबे समय तक संबंध में रहता है, तो यह माना जाएगा कि सहमति स्वेच्छा से दी गई थी। कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में जहां पुरुष शादी करने में असमर्थ है, उसे आत्महत्या के लिए उकसाने का भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि उसका सीधा इरादा पीड़ित को जान देने के लिए मजबूर करना न हो। यह फैसला भारत के कानूनी परिदृश्य में एक बड़ी नजीर के रूप में देखा जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय उन मामलों में पुरुषों को राहत देगा जहाँ आपसी अनबन के कारण रिश्ते टूट जाते हैं और बाद में उन्हें आपराधिक मुकदमों का सामना करना पड़ता है। प्रवासी भारतीय समुदाय, विशेषकर ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों के लिए भी यह खबर महत्वपूर्ण है, क्योंकि वैवाहिक कानूनों और सहमति से जुड़े मामलों पर वहां भी अक्सर चर्चा होती रहती है। भारत में बदल रहे कानूनी रुझान वैश्विक स्तर पर रह रहे भारतीयों के लिए कानूनी समझ विकसित करने में सहायक होते हैं।
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