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भारत की श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी: क्रेच सुविधाओं की कमी बनी सबसे बड़ी बाधा

ICN24 Newsroom 3 जुल॰ 2026, 06:31 am
भारत की श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी: क्रेच सुविधाओं की कमी बनी सबसे बड़ी बाधा

भारत की अर्थव्यवस्था में महिलाओं की पूरी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षित और सुलभ क्रेच सुविधाओं का होना अनिवार्य है, जो वर्तमान में एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

भारत की विकास गाथा में महिलाओं की भूमिका को लेकर अक्सर चर्चा होती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज भी लाखों महिलाएं अपने बच्चों की देखभाल की चिंता के कारण कार्यबल से बाहर रहने को मजबूर हैं। यदि भारत को अपनी पूरी आर्थिक क्षमता का लाभ उठाना है, तो उसे सबसे पहले 'क्रेच' (शिशुगृह) की बुनियादी समस्याओं का समाधान करना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षित और किफायती बाल देखभाल सुविधाओं की कमी भारतीय महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी (LFPR) में गिरावट का एक प्रमुख कारण है। भारत में कामकाजी महिलाओं के लिए मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम, 2017 के तहत 50 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले संस्थानों के लिए क्रेच सुविधा अनिवार्य की गई थी। हालांकि, कार्यान्वयन के स्तर पर इसमें भारी खामियां देखी गई हैं। कई कंपनियों में या तो क्रेच की सुविधा ही नहीं है, या फिर उनकी गुणवत्ता इतनी खराब है कि माता-पिता अपने बच्चों को वहां छोड़ने में असुरक्षित महसूस करते हैं। यह समस्या केवल संगठित क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली करोड़ों महिलाओं के लिए तो यह चुनौती और भी विकट है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के संदर्भ में देखें तो, वहां की प्रवासियों को अक्सर 'ज्वाइंट फैमिली' या दादा-दादी के सहयोग के बिना बच्चों को पालना पड़ता है। ऑस्ट्रेलिया की महंगी चाइल्डकेयर प्रणाली वहां के भारतीय प्रवासियों के लिए एक बड़ी चुनौती रही है, लेकिन वहां सरकार की ओर से मिलने वाली सब्सिडी और कड़े नियामक ढांचे के कारण कामकाजी माताओं को कुछ राहत मिलती है। इसके विपरीत, भारत में सामाजिक अपेक्षाएं आज भी महिलाओं से ही घर और बच्चे संभालने की उम्मीद करती हैं, जिससे उनके करियर पर 'मदरहुड पेनल्टी' का बोझ बढ़ जाता है। आर्थिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में महिला श्रम भागीदारी दर वैश्विक औसत से काफी कम है। जब एक महिला मां बनती है, तो उसके पास अक्सर दो ही विकल्प बचते हैं: या तो वह नौकरी छोड़ दे या फिर बच्चे को असुरक्षित हाथों में छोड़कर काम पर जाए। इस मानसिक तनाव का असर उनकी कार्यक्षमता पर भी पड़ता है। कॉर्पोरेट जगत और सरकार को यह समझना होगा कि क्रेच केवल एक कल्याणकारी सुविधा नहीं, बल्कि एक आर्थिक निवेश है। यदि कार्यस्थलों पर विश्वसनीय क्रेच होंगे, तो महिलाएं अधिक आत्मविश्वास के साथ काम कर सकेंगी और कार्यबल में बनी रहेंगी। भविष्य की राह के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल को अपनाना आवश्यक है। सरकार को छोटे उद्योगों के लिए साझा क्रेच केंद्रों को बढ़ावा देना चाहिए और मौजूदा नियमों को कड़ाई से लागू करना चाहिए। इसके अलावा, समाज में पितृसत्तात्मक सोच को बदलना भी जरूरी है, ताकि बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी केवल महिलाओं पर न रहे। जब तक भारत अपने 'केयर इंफ्रास्ट्रक्चर' को मजबूत नहीं करता, तब तक 'विकसित भारत' का सपना अधूरा ही रहेगा।
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