राजनीति
बिहार: 10 अगस्त को 'जेल भरो आंदोलन' की तैयारी, 25 जुलाई को समस्तीपुर में जुटेगा संयुक्त कन्वेंशन
ICN24 Newsroom 20 जुल॰ 2026, 04:34 am

बिहार प्रांतीय खेतिहर मजदूर यूनियन ने केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ 10 अगस्त को जेल भरो आंदोलन का आह्वान किया है, जिसकी रणनीति 25 जुलाई को समस्तीपुर में तय होगी।
बिहार के कृषि क्षेत्र में एक बार फिर बड़े आंदोलन की आहट सुनाई दे रही है। बिहार प्रांतीय खेतिहर मजदूर यूनियन ने आगामी 10 अगस्त को राज्यव्यापी 'जेल भरो आंदोलन' करने की घोषणा की है। इस बड़े प्रदर्शन की सफलता सुनिश्चित करने और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को एकजुट करने के लिए यूनियन ने 25 जुलाई को समस्तीपुर में एक 'संयुक्त कन्वेंशन' आयोजित करने का निर्णय लिया है। यह निर्णय हाल ही में हुई यूनियन की एक उच्च स्तरीय बैठक में लिया गया, जहाँ पदाधिकारियों ने केंद्र सरकार की मौजूदा आर्थिक और कृषि नीतियों के प्रति कड़ा रोष व्यक्त किया।
समस्तीपुर में होने वाले इस संयुक्त कन्वेंशन को आंदोलन की आधारशिला माना जा रहा है। बैठक में वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार की नीतियां खेतिहर मजदूरों और सीमांत किसानों के हितों के खिलाफ हैं। यूनियन का आरोप है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं और महंगाई के कारण न्यूनतम मजदूरी में जीवन यापन करना असंभव हो गया है। 25 जुलाई के कन्वेंशन में विभिन्न जिलों के प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे, जहाँ आंदोलन की विस्तृत रूपरेखा और गिरफ्तारी देने वाले जत्थों की सूची तैयार की जाएगी।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए, विशेषकर उन लोगों के लिए जिनकी जड़ें बिहार के ग्रामीण अंचलों से जुड़ी हैं, यह समाचार महत्वपूर्ण है। बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है और वहाँ के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने में खेतिहर मजदूरों की भूमिका सर्वोपरि है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे कई प्रवासी भारतीय अभी भी अपने पैतृक गांवों में खेती-किसानी से जुड़े हुए हैं और वहां की नीतियों में होने वाले बदलावों का असर उनके परिवारों पर सीधे तौर पर पड़ता है। बिहार में इस तरह के बड़े आंदोलन अक्सर राज्य की राजनीति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं।
'जेल भरो आंदोलन' भारतीय राजनीति में विरोध का एक पारंपरिक और प्रभावी तरीका रहा है। इसका उद्देश्य जेलों को शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों से भरकर सरकार पर नैतिक और प्रशासनिक दबाव बनाना होता है। यूनियन के नेताओं का कहना है कि वे अपनी मांगों को लेकर तब तक पीछे नहीं हटेंगे जब तक सरकार उनकी समस्याओं का ठोस समाधान नहीं निकालती। मुख्य मांगों में मजदूरी में वृद्धि, मनरेगा के तहत काम के दिनों को बढ़ाना और भूमिहीनों के लिए आवास की व्यवस्था शामिल है।
25 जुलाई का कन्वेंशन न केवल तैयारियों की समीक्षा करेगा, बल्कि राज्य के अन्य किसान संगठनों और श्रमिक संघों के साथ समन्वय स्थापित करने का मंच भी बनेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह आंदोलन व्यापक रूप लेता है, तो आने वाले समय में यह बिहार की क्षेत्रीय राजनीति में एक नया मोड़ ला सकता है। फिलहाल, समस्तीपुर से लेकर पटना तक की सियासी गलियारों में 10 अगस्त की तारीख को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
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