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उत्तर प्रदेश में बंगाली शरणार्थियों ने की जाति वर्गीकरण की मांग; बड़े आंदोलन की चेतावनी
ICN24 Newsroom 15 जून 2026, 04:01 am
यूपी में बसे बंगाली शरणार्थी समुदायों ने नमोशूद्र जैसी जातियों के लिए अनुसूचित जाति (SC) के दर्जे की मांग तेज कर दी है।
उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में बसे बंगाली शरणार्थी समुदाय ने राज्य सरकार से जातिगत वर्गीकरण और आरक्षण के लाभ प्रदान करने की अपनी लंबे समय से चली आ रही मांग को फिर से दोहराया है। समुदाय के प्रतिनिधियों का कहना है कि पश्चिम बंगाल में उन्हें अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा प्राप्त है, लेकिन उत्तर प्रदेश में उन्हें इन श्रेणियों से बाहर रखा गया है, जिससे उनके विकास में बाधा आ रही है।
मुख्य रूप से नमोशूद्र, पौंड्र और माझी समुदायों से आने वाले इन प्रवासियों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों को जल्द पूरा नहीं किया गया, तो वे लखनऊ में एक बड़ा विरोध प्रदर्शन करेंगे। उनकी प्राथमिक मांग यह है कि उन्हें उत्तर प्रदेश में भी वही जातिगत मान्यता दी जाए जो उनके पूर्वजों को अविभाजित बंगाल या वर्तमान पश्चिम बंगाल में प्राप्त थी।
इस समुदाय के लिए आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है। वर्तमान में, जाति प्रमाण पत्र न होने के कारण इन परिवारों के युवाओं को सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है। साथ ही, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के कोटे और भूमि अधिकारों को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। कई बंगाली बस्तियों में भूमि के मालिकाना हक को लेकर कानूनी पेचीदगियां हैं, जिससे वे सरकारी योजनाओं का पूर्ण लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं।
ऐतिहासिक रूप से, ये परिवार 1950 और 1960 के दशक के दौरान तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से विस्थापित होकर भारत आए थे। भारत सरकार ने उन्हें उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्रों और अन्य जिलों में बसाया था। हालांकि दशकों बीत जाने के बाद भी, उनकी पहचान और अधिकारों का मुद्दा राजनीतिक गलियारों में अटका हुआ है।
यह मामला न केवल उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीयों के लिए भी प्रासंगिक है। ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में रह रहे बंगाली समुदाय के लोग अपनी जड़ों से गहराई से जुड़े हुए हैं। सिडनी और मेलबर्न में रहने वाले कई भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई अपनी विरासत को लेकर मुखर हैं और वे भारत में अपने समुदाय के हाशिए पर रहने वाले वर्गों के अधिकारों का समर्थन करते हैं। इस तरह के सामाजिक और कानूनी संघर्ष वैश्विक स्तर पर भारतीय प्रवासियों के बीच चर्चा का विषय बनते हैं, जो अक्सर अपनी सामुदायिक पहचान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संरक्षित करने का प्रयास करते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार इस मुद्दे का समाधान नहीं करती है, तो यह आगामी चुनावों में एक महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा बन सकता है। समुदाय के नेताओं ने स्पष्ट किया है कि वे अब और प्रतीक्षा करने के मूड में नहीं हैं और अपने अधिकारों के लिए कानूनी और लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रखेंगे।
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