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ऑस्ट्रेलियाई किसानों के सामने खड़ा हुआ प्लास्टिक कचरे का बड़ा संकट, समाधान की तलाश जारी

ICN24 Newsroom 30 जुल॰ 2026, 12:35 pm
ऑस्ट्रेलियाई किसानों के सामने खड़ा हुआ प्लास्टिक कचरे का बड़ा संकट, समाधान की तलाश जारी

सब्जी उत्पादन में सहायक प्लास्टिक वीड मैट्स अब किसानों के लिए रसद और लागत का बड़ा बोझ बन गई हैं, जिससे भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई किसान भी चिंतित हैं।

ऑस्ट्रेलिया के कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल ने पैदावार तो बढ़ाई है, लेकिन इसके साथ ही एक गंभीर पर्यावरणीय और आर्थिक चुनौती भी खड़ी हो गई है। सब्जी उगाने वाले किसान लंबे समय से अपनी फसलों को खरपतवार से बचाने के लिए काले और सफेद प्लास्टिक 'वीड मैट्स' (weed mats) का उपयोग करते आ रहे हैं। ये मैट्स न केवल पौधों को शुरुआती दौर में सुरक्षा प्रदान करती हैं, बल्कि मिट्टी में नमी बनाए रखने में भी सहायक होती हैं। हालांकि, फसल कटने के बाद इन हजारों किलोमीटर लंबे प्लास्टिक कचरे का निपटान अब किसानों के लिए एक बड़ी मुसीबत बन गया है। ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख कृषि क्षेत्रों, जैसे कि क्वींसलैंड का लॉकयर वैली और विक्टोरिया के ग्रामीण इलाकों में, जहाँ भारतीय समुदाय के किसानों की एक बड़ी संख्या है, यह समस्या विशेष रूप से चिंताजनक है। कई भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई किसान जो छोटे और मध्यम स्तर पर बागवानी (horticulture) से जुड़े हैं, उनके लिए इस प्लास्टिक कचरे को हटाना और उसे लैंडफिल (कचरा डंप करने वाली जगह) तक पहुँचाना न केवल महंगा पड़ता जा रहा है, बल्कि इसके लिए आवश्यक श्रम की भी भारी कमी है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन प्लास्टिक शीटों का पुनर्चक्रण (recycling) करना काफी कठिन होता है क्योंकि खेत से निकलने के बाद ये अक्सर मिट्टी, कीटनाशकों और जैविक कचरे से सनी होती हैं। कई रिसाइक्लिंग प्लांट गंदगी के कारण इस प्लास्टिक को स्वीकार करने से मना कर देते हैं। परिणामस्वरूप, किसानों के पास इसे डंप करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता, जिसके लिए उन्हें भारी शुल्क चुकाना पड़ता है। कुछ मामलों में, किसान इस कचरे को खेतों के कोनों में जमा करने को मजबूर हैं, जो भविष्य में एक बड़े पर्यावरणीय संकट का संकेत है। भारतीय समुदाय से आने वाले किसानों का कहना है कि सरकार को इस दिशा में ठोस पहल करनी चाहिए। खेती की लागत पहले से ही बढ़ रही है, और अब कचरा प्रबंधन का यह अतिरिक्त बोझ मुनाफे को कम कर रहा है। किसानों की मांग है कि या तो सरकार बायोडिग्रेडेबल (जैव-अपघटनीय) विकल्पों पर सब्सिडी दे या कृषि प्लास्टिक के लिए विशेष रिसाइक्लिंग सेंटर स्थापित किए जाएं। फिलहाल, कुछ शोधकर्ता ऐसे विकल्पों पर काम कर रहे हैं जो मिट्टी में ही घुल जाएं, लेकिन उनकी कीमत पारंपरिक प्लास्टिक की तुलना में काफी अधिक है। जब तक कोई किफायती और सुलभ समाधान नहीं मिलता, तब तक यह प्लास्टिक कचरा ऑस्ट्रेलिया की हरित क्रांति के पीछे एक काला दाग बना रहेगा।
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