राजनीति
मुजफ्फरनगर दंगों पर जो सैको के उपन्यास को वापस लेने के पेंग्विन के फैसले से अरुंधति रॉय दुखी
ICN24 Newsroom 7 जून 2026, 03:30 pm

लेखिका अरुंधति रॉय ने मुजफ्फरनगर दंगों पर आधारित जो सैको के ग्राफिक उपन्यास का वितरण रोकने के पेंग्विन रैंडम हाउस के फैसले की कड़ी आलोचना की है।
बुकर पुरस्कार विजेता लेखिका अरुंधति रॉय ने प्रकाशक पेंग्विन रैंडम हाउस द्वारा प्रसिद्ध ग्राफिक उपन्यासकार जो सैको की आगामी पुस्तक के वितरण को रोकने के निर्णय पर अपनी गहरी नाराजगी और दुख व्यक्त किया है। यह पुस्तक 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों पर आधारित है, जिसे प्रकाशक ने कथित तौर पर बाजार से वापस लेने का फैसला किया है। रॉय ने इस कदम को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार और प्रकाशक की तरफ से एक गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार करार दिया है।
अरुंधति रॉय ने एक आधिकारिक बयान में कहा कि वह पेंग्विन के इस अचानक लिए गए फैसले से काफी आहत हैं। उन्होंने जो सैको को दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली ग्राफिक उपन्यासकारों में से एक बताया और कहा कि उनके काम को रोकना न केवल एक लेखक का अपमान है, बल्कि पाठकों को सच्चाई से वंचित रखना भी है। रॉय ने प्रकाशक पर आरोप लगाया कि वे अपने वादे से पीछे हट रहे हैं और दबाव में आकर घुटने टेक रहे हैं।
अपने बयान में लेखिका ने सीधे तौर पर केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि देश में आलोचनात्मक आवाजों के प्रति सरकार की प्रतिशोध की भावना बढ़ती जा रही है, जिसके कारण बड़े प्रकाशन संस्थान भी अब जोखिम लेने से कतरा रहे हैं। रॉय के अनुसार, यह फैसला केवल एक किताब के बारे में नहीं है, बल्कि उस माहौल के बारे में है जहाँ अप्रिय सत्यों को दबाया जा रहा है।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए यह घटना भारत में मीडिया और कलात्मक स्वतंत्रता की वर्तमान स्थिति को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में सक्रिय भारतीय प्रवासी अक्सर भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक बहसों में गहरी रुचि रखते हैं। यह विवाद न केवल साहित्य जगत तक सीमित है, बल्कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों और सेंसरशिप की बढ़ती प्रवृत्तियों पर भी एक वैश्विक बहस को जन्म देता है।
जो सैको को उनके युद्ध पत्रकारिता और ग्राफिक कथाओं के मेल के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाना जाता है। मुजफ्फरनगर दंगों पर उनकी यह कृति काफी प्रतीक्षित थी। पेंग्विन रैंडम हाउस ने अभी तक इस निर्णय के पीछे के सटीक कानूनी या तकनीकी कारणों पर कोई विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी नहीं किया है, लेकिन रॉय की प्रतिक्रिया ने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मंच पर ला खड़ा किया है।
अंत में, अरुंधति रॉय ने पाठकों और नागरिक समाज से अपील की कि वे ऐसी प्रवृत्तियों के खिलाफ एकजुट हों। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि प्रकाशक और बुद्धिजीवी डरे रहेंगे, तो भविष्य में इतिहास के महत्वपूर्ण पन्नों को इसी तरह मिटाया जाता रहेगा।
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