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'अमेरिकन ड्रीम' का मोहभंग: तीन साल बाद थाई महिला ने अमेरिका छोड़ने का किया फैसला, कहा- 'यहां जिंदगी सिर्फ एक चूहा दौड़ है'

ICN24 Newsroom 8 अग॰ 2026, 10:37 am
'अमेरिकन ड्रीम' का मोहभंग: तीन साल बाद थाई महिला ने अमेरिका छोड़ने का किया फैसला, कहा- 'यहां जिंदगी सिर्फ एक चूहा दौड़ है'

एक थाई महिला का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने अमेरिका में अपने संघर्षों और वहां की व्यस्त जीवनशैली से दुखी होकर वापस थाईलैंड लौटने की इच्छा जताई है।

संयुक्त राज्य अमेरिका को दशकों से अवसरों की भूमि और 'अमेरिकन ड्रीम' का केंद्र माना जाता रहा है। लेकिन हाल ही में एक थाई महिला के अनुभवों ने इस धारणा पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। एक अमेरिकी नागरिक से शादी करने के बाद अमेरिका में बसी इस महिला ने घोषणा की है कि वह तीन साल बाद इस देश को छोड़कर वापस थाईलैंड लौटना चाहती है। उसका कहना है कि जिस 'अमेरिकन ड्रीम' की उसने कल्पना की थी, वह अब मर चुका है और यहां का जीवन केवल एक अंतहीन 'चूहा दौड़' (rat race) बनकर रह गया है। सोशल मीडिया पर साझा किए गए अपने अनुभव में, महिला ने विस्तार से बताया कि कैसे अमेरिका में जीवन की वास्तविकता उसकी उम्मीदों से कोसों दूर थी। उसने कहा कि अमेरिका आने से पहले उसे लगा था कि यहां जीवन बेहतर और खुशहाल होगा, लेकिन यहां पहुंचने के बाद उसे अहसास हुआ कि लोग केवल बिल भरने और जीवित रहने के लिए मशीन की तरह काम कर रहे हैं। उसके अनुसार, अमेरिका में सामाजिक जुड़ाव की कमी है और लोग काम के बोझ के नीचे दबे हुए हैं, जिससे मानसिक शांति पूरी तरह खत्म हो गई है। यह कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं है, बल्कि यह उन लाखों प्रवासियों की भावनाओं को दर्शाती है जो पश्चिमी देशों में बेहतर भविष्य की तलाश में जाते हैं। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के संदर्भ में देखें तो यह मुद्दा और भी प्रासंगिक हो जाता है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय प्रवासियों के बीच भी अक्सर इस बात पर चर्चा होती है कि क्या 'वेस्टर्न लाइफस्टाइल' की चकाचौंध उनके मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक मूल्यों की कीमत पर मिल रही है। सिडनी और मेलबर्न जैसे महंगे शहरों में रहने वाले कई भारतीय परिवार भी आज बढ़ती महंगाई, आवास संकट और काम के दबाव के कारण इसी तरह के 'बर्नआउट' का सामना कर रहे हैं। थाई महिला ने अपने वीडियो में यह भी उल्लेख किया कि थाईलैंड में जीवन सरल था और वहां सामुदायिक समर्थन अधिक था। उसने तर्क दिया कि अमेरिका में भले ही पैसा अधिक हो, लेकिन जीवन की गुणवत्ता और खुशी का स्तर बहुत कम है। उसने कहा, "हर दिन एक ही ढर्रे पर चलता है—उठो, काम पर जाओ, वापस आओ और सो जाओ ताकि अगले दिन फिर से काम पर जा सको। इसमें खुद के लिए या परिवार के लिए कोई समय नहीं बचता।" विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में मुद्रास्फीति और जीवनयापन की बढ़ती लागत ने विकसित देशों के आकर्षण को कम कर दिया है। प्रवासियों को अब केवल आर्थिक लाभ नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता, सुरक्षा और सामाजिक ताने-बाने की भी चिंता है। इस थाई महिला का अनुभव एक चेतावनी की तरह है कि विदेशी धरती पर सफलता का पैमाना केवल डॉलर या लग्जरी नहीं हो सकता। अंततः, मानसिक संतुष्टि और अपनों के बीच रहना ही सबसे बड़ी पूंजी है।
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